🪔 अनंत चतुर्दशी व्रत कथा 🪔


🕉️ 1️⃣ मंगलाचरण

ॐ श्रीगणेशाय नमः।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
ॐ अनन्ताय नमः।

हे अनन्त भगवान! आप ही समस्त लोकों के आधार, अनादि-अनन्त परमात्मा तथा समय के भी स्वामी हैं। आपकी शरण से ही जीवन में स्थिरता, समृद्धि और संकटों से रक्षा प्राप्त होती है। हम श्रद्धा-भक्ति से इस अनन्त चतुर्दशी व्रत का संकल्प करते हैं — कृपा कर हमारे जीवन को भी अनन्त सुख, शांति और धर्म से परिपूर्ण करें। 🙏✨


📖 2️⃣ परिचय

अनन्त चतुर्दशी भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को किया जाने वाला अत्यंत पवित्र व्रत है।
यह व्रत भगवान अनन्त रूप श्रीविष्णु को समर्पित है।

🔹 “अनन्त” का अर्थ — जिसका अंत न हो, जो सनातन हो, जो समय और सृष्टि से परे हो।
🔹 इस दिन भगवान विष्णु के शेषनाग पर विराजमान स्वरूप की पूजा की जाती है।
🔹 इस व्रत में विशेष अनन्त सूत्र (डोरा) बाँधा जाता है जिसमें 14 गांठें होती हैं — ये 14 लोकों एवं 14 मनुओं का प्रतीक हैं।

इस व्रत का उद्देश्य —
👉 जीवन में स्थिर लक्ष्मी
👉 पारिवारिक सुख
👉 कष्ट-निवारण
👉 दीर्घकालीन समृद्धि


📜 3️⃣ शास्त्रीय आधार

यह व्रत स्कन्द पुराण तथा अन्य वैष्णव ग्रंथों में वर्णित है।

शास्त्रों में भगवान विष्णु को ही अनन्त ब्रह्म कहा गया है —

वही अनन्त समय हैं, वही धर्म के आधार हैं, वही सृष्टि का पालन करते हैं।

शेषनाग को अनन्त का स्वरूप माना गया है —
उनके सहारे ही पृथ्वी टिकी है।

इसलिए जो व्यक्ति अनन्त का आश्रय लेता है, उसका जीवन भी डगमगाता नहीं —
धन, परिवार, भाग्य और धर्म स्थिर रहते हैं।


🪔 4️⃣ पूजा विधि


🧹 (1) प्रातः तैयारी

  • प्रातः स्नान करके स्वच्छ पीले या लाल वस्त्र पहनें
  • घर या पूजा स्थान शुद्ध करें
  • लकड़ी की चौकी पर पीला वस्त्र बिछाएँ

🪷 (2) स्थापना

चौकी पर स्थापित करें —

  • भगवान विष्णु या अनन्त स्वरूप चित्र/प्रतिमा
  • कलश (जल, आम्रपल्लव, नारियल सहित)
  • शेषनाग का चित्र/आकृति (यदि उपलब्ध हो)

🧵 (3) अनन्त सूत्र बनाना

  • कच्चे सूत या रेशमी धागे में 14 गांठें लगाएँ
  • हल्दी या केसर से रंगें
  • यही “अनन्त डोरा” कहलाता है

🌼 (4) पूजन सामग्री

  • कुंकुम, अक्षत
  • दूर्वा
  • पंचामृत
  • धूप-दीप
  • फल-मिष्ठान
  • पूड़ी-हलवा (विशेष नैवेद्य)

🪔 (5) पूजन क्रम

  1. गणेश पूजन
  2. कलश पूजन
  3. भगवान विष्णु/अनन्त पूजन
  4. शेषनाग पूजन
  5. 14 गांठों वाले डोरे का पूजन

🧵 (6) डोरा बाँधना

  • पुरुष 👉 दाहिने हाथ में
  • स्त्री 👉 बाएँ हाथ में

“ॐ अनन्ताय नमः” बोलकर बाँधें

🍚 (7) नैवेद्य

पूड़ी-हलवा अर्पित करें, फिर परिवार सहित प्रसाद ग्रहण करें।


🌟 5️⃣ फल 

इस व्रत के करने से —

✨ धन की स्थिरता
✨ कर्ज से मुक्ति
✨ परिवार में प्रेम
✨ रोग-शोक नाश
✨ भाग्य जागरण
✨ व्यापार-उन्नति
✨ जीवन में स्थायी सुख

विशेष —
जो व्यक्ति 14 वर्षों तक यह व्रत करता है, उसके जीवन में बड़ी बाधाएँ समाप्त हो जाती हैं और स्थायी लक्ष्मी प्राप्त होती है।


📿 6️⃣ नियम

  • व्रत दिनभर श्रद्धा से रखें (फलाहार या निराहार)
  • क्रोध, झूठ और अपशब्द से बचें
  • नमक-रहित भोजन उत्तम माना गया
  • डोरा 14 दिन या अगले वर्ष तक रखें (परम्परा अनुसार)
  • 14 वर्षों तक व्रत करने का विशेष महत्व

🚫 निषेध

  • डोरे का अपमान
  • व्रत बीच में छोड़ना
  • अशुद्ध अवस्था में पूजा

7️⃣🪔 अनंत चतुर्दशी व्रत कथा प्रारंभ 🪔

बहुत प्राचीन समय की बात है, जब पृथ्वी पर धर्म, सत्य और तप की महिमा चारों ओर विद्यमान थी, तब सुमन्त नाम के एक ब्राह्मण रहते थे। वे वेदों के ज्ञाता, सत्यवादी और शांत स्वभाव के थे, परंतु उनका पारिवारिक जीवन अत्यंत दुखों से भरा था। उनकी पहली पत्नी का नाम दीक्षा था, जो अत्यंत पतिव्रता और धर्मपरायण थी। उसी के गर्भ से एक सुंदर और तेजस्विनी कन्या उत्पन्न हुई जिसका नाम सुषीला रखा गया। लेकिन दुर्भाग्य से सुषीला के जन्म के कुछ ही समय बाद उसकी माता का देहांत हो गया। सुमन्त ने समाज के आग्रह पर दूसरी पत्नी करकशा से विवाह किया। जैसा नाम वैसा स्वभाव — वह स्त्री कठोर वाणी बोलने वाली, ईर्ष्यालु और अत्यंत क्रूर थी।

बचपन से ही सुषीला ने सुख का मुख नहीं देखा। उसकी सौतेली माँ उसे हर समय तिरस्कार करती, भूखा रखती, और कठिन कार्य करवाती। वह नन्ही बालिका घर का सारा काम करती, गोबर उठाती, जल भरती, चूल्हा जलाती, और रात को भूखी सो जाती, पर उसके मुख से कभी शिकायत नहीं निकली। वह मन ही मन भगवान विष्णु का स्मरण करती और सोचती कि कोई तो होगा जो सब देख रहा है। धीरे-धीरे वह कन्या बड़ी हुई और उसके रूप तथा विनम्र स्वभाव की चर्चा दूर-दूर तक फैल गई।

जब वह विवाह योग्य हुई तब सुमन्त ने एक योग्य वर की खोज की। उन्हें कौण्डिन्य नाम का एक विद्वान ब्राह्मण मिला जो अत्यंत तेजस्वी, वेदों का ज्ञाता और स्वाभिमानी था। सुमन्त ने प्रसन्न होकर अपनी कन्या का विवाह कौण्डिन्य से कर दिया। परंतु करकशा को यह विवाह बिल्कुल पसंद नहीं था क्योंकि वह सुषीला से घृणा करती थी। विवाह के बाद जब विदाई का समय आया तो उसने दहेज में कुछ भी देने से मना कर दिया। बहुत आग्रह करने पर उसने केवल थोड़ा सा आटा, एक टूटी टोकरी और कुछ बर्तन दे दिए। सुमन्त लज्जित थे पर वे असहाय थे।

कौण्डिन्य और सुषीला विवाह के बाद अपने आश्रम की ओर पैदल ही चल पड़े। मार्ग लंबा था और सूर्य अस्त होने को था। चलते-चलते वे एक नदी के किनारे पहुँचे जहाँ कुछ स्त्रियाँ अत्यंत श्रद्धा से पूजा कर रही थीं। वे पीले वस्त्र पहने थीं, भूमि को गोबर से लीपकर चौक बनाया था और वहाँ एक धागे में चौदह गाँठें बाँधकर पूजन कर रही थीं। सुषीला ने कौतूहलवश उनसे पूछा — “हे माताओं, आप कौन सा व्रत कर रही हैं? इसका क्या फल है?”

स्त्रियों ने प्रेम से कहा — “यह अनन्त भगवान का व्रत है। जो मनुष्य श्रद्धा से यह व्रत करता है उसके सभी दुःख दूर हो जाते हैं, घर में धन, सुख और शांति आती है तथा भगवान विष्णु स्वयं उसकी रक्षा करते हैं।” सुषीला ने विनम्रता से निवेदन किया कि उसे भी विधि बताई जाए। उन्होंने उसे चौदह गाँठों वाला अनन्त सूत्र दिया और कहा कि श्रद्धा से इसे धारण करना, यह स्वयं भगवान अनन्त का स्वरूप है।

सुषीला ने अत्यंत श्रद्धा से भगवान का स्मरण कर वह सूत्र अपने हाथ में बाँध लिया और पति के साथ आगे बढ़ गई। रात को वे एक वृक्ष के नीचे ठहरे और अगले दिन अपने निवास स्थान पहुँच गए। आश्चर्य की बात यह हुई कि जहाँ पहले एक छोटा सा जर्जर आश्रम था, वहाँ अब सुन्दर भवन खड़ा था, गौशाला में गायें थीं, अन्न के भंडार भरे हुए थे और चारों ओर समृद्धि थी। कौण्डिन्य आश्चर्यचकित रह गए।

कुछ ही समय में उनका जीवन अत्यंत सुखमय हो गया। धन, सम्मान, यश और वैभव सब उनके चरण चूमने लगे। लोग उन्हें महान ब्राह्मण कहकर आदर देने लगे। परंतु मनुष्य का स्वभाव विचित्र है — जब सुख मिलता है तो वह उसके कारण को भूल जाता है। एक दिन कौण्डिन्य की दृष्टि सुषीला के हाथ में बँधे धागे पर पड़ी। उन्होंने पूछा — “यह क्या है?”

सुषीला ने विनम्रता से कहा — “यह अनन्त भगवान का सूत्र है, इन्हीं की कृपा से हमें यह वैभव प्राप्त हुआ है।”

कौण्डिन्य को यह सुनकर क्रोध आ गया। वे स्वाभिमानी थे और उन्हें लगा कि उनकी तपस्या और विद्या का अपमान किया जा रहा है। उन्होंने कहा — “मेरे परिश्रम से यह सब मिला है, किसी धागे से नहीं!”

इतना कहकर उन्होंने वह सूत्र तोड़कर अग्नि में फेंक दिया। सुषीला ने घबराकर उसे निकालकर दूध में रखा परंतु अपमान तो हो चुका था। उसी क्षण से उनके दुर्भाग्य का आरम्भ हुआ।

कुछ ही दिनों में घर का धन नष्ट हो गया, गौशाला खाली हो गई, अन्न समाप्त हो गया, मित्र दूर हो गए, और दरिद्रता ने घेर लिया। जो लोग पहले सम्मान करते थे वे तिरस्कार करने लगे। अंततः ऐसी स्थिति आई कि उन्हें घर छोड़कर वन में भटकना पड़ा।

कौण्डिन्य को समझ आ गया कि यह सब भगवान अनन्त के अपमान का परिणाम है। वे अत्यंत पश्चाताप करने लगे और भगवान की खोज में निकल पड़े। वे पर्वतों, नदियों, जंगलों में भटकते रहे। मार्ग में उन्हें एक आम का वृक्ष मिला जो सूखा खड़ा था। उन्होंने उससे पूछा — “क्या तुमने अनन्त भगवान को देखा?” वृक्ष बोला — “मैं अपने पूर्व जन्म में एक पंडित था, ज्ञान था पर घमंड भी था, इसलिए आज वृक्ष बनकर खड़ा हूँ, मैं नहीं जानता।”

आगे बढ़े तो एक गौ माता मिली, वह अत्यंत दुर्बल थी। उसने कहा — “मैं पूर्व जन्म में धनी स्त्री थी, दान नहीं किया इसलिए यह दशा है।” फिर एक बैल मिला जो थका हुआ था, उसने भी यही कहा। एक गधा मिला, एक हाथी मिला — सभी अपने कर्मों का फल भोग रहे थे पर किसी को भगवान अनन्त का पता न था।

कौण्डिन्य निराश होकर आगे बढ़ते रहे। अंत में वे अत्यंत थककर भूमि पर गिर पड़े और रोते हुए बोले — “हे अनन्त प्रभु, मैं अपराधी हूँ, मुझे क्षमा करें।”

तभी वहाँ एक वृद्ध ब्राह्मण प्रकट हुए। उन्होंने प्रेम से उन्हें उठाया और एक गुफा में ले गए जहाँ दिव्य प्रकाश फैल रहा था। वहाँ कौण्डिन्य ने दिव्य सिंहासन पर चतुर्भुज भगवान विष्णु को शेषनाग पर विराजमान देखा। उनकी आँखों से आँसू बह निकले।

भगवान ने कहा — “हे कौण्डिन्य, मैंने ही तेरी परीक्षा ली थी। तूने अभिमानवश मेरा अपमान किया, इसलिए यह कष्ट भोगा। अब यदि तू चौदह वर्षों तक श्रद्धा से अनन्त व्रत करेगा तो सब सुख प्राप्त करेगा।”

कौण्डिन्य ने प्रणाम कर क्षमा माँगी और व्रत करने का संकल्प लिया। जैसे ही उन्होंने संकल्प लिया, वे अपने आश्रम में लौट आए। वहाँ सुषीला उनकी प्रतीक्षा कर रही थी। उन्होंने पूरी कथा सुनाई और दोनों ने श्रद्धा से अनन्त भगवान का स्मरण किया।

समय बीतता गया और उन्होंने नियमपूर्वक श्रद्धा रखी। धीरे-धीरे उनके जीवन में फिर से सुख आने लगा। धन, सम्मान और शांति लौट आई, पर अब उनमें अहंकार नहीं था। वे जानते थे कि सब भगवान की कृपा है।

उनका जीवन अंत तक सुख और धर्म में बीता और मृत्यु के बाद वे विष्णुलोक को प्राप्त हुए।

इसी कारण जो मनुष्य श्रद्धा से अनन्त भगवान का स्मरण करता है, अहंकार त्यागता है और विश्वास रखता है, उसके जीवन के बंधन कट जाते हैं और उसे अनन्त सुख प्राप्त होता है।


8️⃣ समापन

अनन्त चतुर्दशी व्रत हमें यह सिखाता है कि जीवन की स्थिरता धन से नहीं —
ईश्वर के आश्रय से आती है।

जो व्यक्ति अनन्त भगवान को जीवन का आधार मानता है, उसका भाग्य भी अनन्त हो जाता है।

अतः श्रद्धा-भक्ति से किया गया यह व्रत केवल एक दिन की पूजा नहीं, बल्कि
👉 स्थिर विश्वास
👉 धैर्य
👉 और भगवान पर पूर्ण भरोसे का संकल्प है।

ॐ अनन्ताय नमः — हमारे जीवन में भी सुख-समृद्धि अनन्त हो। 🌼🕉️



🪔 संतान गोपाल व्रत कथा 🪔


1️⃣ मंगलाचरण 🙏

॥ ॐ श्री गणेशाय नमः ॥
॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
॥ ॐ देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ॥

हे देवकीनन्दन श्रीकृष्ण!
आप समस्त संसार के पालनहार हैं, कृपा कर हमें उत्तम, स्वस्थ, दीर्घायु एवं संस्कारी संतान का आशीर्वाद प्रदान करें।


2️⃣ परिचय 📖

संतान गोपाल व्रत भगवान श्रीकृष्ण के बालरूप संतान गोपाल को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है।

यह व्रत मुख्यतः —

  • संतान प्राप्ति हेतु
  • गर्भ रक्षा हेतु
  • संतानों के स्वास्थ्य हेतु
  • बुद्धिमान एवं भाग्यशाली संतान हेतु

किया जाता है।

👉 यह व्रत पति-पत्नी दोनों मिलकर करें तो अधिक फलदायी माना गया है।
👉 जिनको संतान नहीं हो रही या बार-बार गर्भपात हो रहा हो उनके लिए विशेष प्रभावशाली है।


3️⃣ शास्त्रीय आधार 📜

संतान गोपाल उपासना का वर्णन निम्न ग्रंथों में मिलता है —

  • हरिवंश पुराण
  • ब्रह्मवैवर्त पुराण
  • नारद पुराण
  • गर्ग संहिता
  • श्रीकृष्ण उपासना तंत्र

इन ग्रंथों के अनुसार श्रीकृष्ण का बालरूप “सृष्टि के पालन और वंश वृद्धि” का अधिष्ठाता है।

मुख्य मंत्र

॥ ॐ देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ॥

इस मंत्र को संतान प्राप्ति मंत्र कहा गया है।


4️⃣ पूजा विधि 🪔


🔹 व्रत कब करें

  • किसी भी गुरुवार से प्रारंभ करें
  • पुष्य नक्षत्र, जन्माष्टमी, पूर्णिमा, एकादशी — अत्यंत शुभ
  • कम से कम 11, 21 या 40 दिन करें

🔹 आवश्यक सामग्री

  • बाल गोपाल की मूर्ति / चित्र
  • पीला वस्त्र
  • पंचामृत
  • तुलसी दल
  • मिश्री
  • मक्खन
  • पीले फूल
  • धूप दीप
  • केले
  • खीर

🔹 पूजा क्रम

1. संकल्प

जल लेकर संकल्प बोले —

मैं अमुक नाम, अमुक गोत्र, श्री संतान गोपाल की कृपा से श्रेष्ठ संतान प्राप्ति हेतु व्रत करता/करती हूँ।


2. स्थापना

  • चौकी पर पीला वस्त्र बिछाएं
  • उस पर बाल गोपाल विराजित करें
  • दाहिनी ओर घी का दीपक जलाएं

3. अभिषेक

पंचामृत से स्नान कराएं —

  1. दूध
  2. दही
  3. घी
  4. शहद
  5. गंगाजल

फिर साफ जल से स्नान कराकर वस्त्र पहनाएं


4. पूजन

  • चंदन तिलक
  • अक्षत
  • पुष्प
  • तुलसी
  • धूप दीप

5. भोग

भगवान को अर्पित करें —

  • मक्खन मिश्री 🧈
  • खीर 🍚
  • केला 🍌

6. मंत्र जाप 📿

कम से कम 108 बार जाप करें —

ॐ देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ॥

अधिक फल हेतु — 11 माला प्रतिदिन


7. आरती

“ॐ जय कन्हैया लाल की” या “आरती कुंज बिहारी की” करें


5️⃣ व्रत का फल

इस व्रत के प्रभाव से —

  • संतान प्राप्ति होती है
  • गर्भ सुरक्षित रहता है
  • रोगी संतान स्वस्थ होती है
  • बुद्धिमान और तेजस्वी पुत्र/पुत्री प्राप्त होती है
  • परिवार में वंश वृद्धि होती है
  • पितृ दोष शांत होता है
  • दांपत्य सुख बढ़ता है

6️⃣ नियम ⚠️

  • ब्रह्मचर्य का पालन करें
  • तामसिक भोजन न करें
  • झूठ न बोलें
  • क्रोध न करें
  • प्रतिदिन तुलसी अर्पित करें
  • व्रत काल में मांस-मदिरा पूर्ण वर्जित
  • पति-पत्नी झगड़ा न करें

विशेष —
गर्भवती महिला केवल फलाहार रख सकती है, कठोर उपवास आवश्यक नहीं।


7️⃣🪔 संतान गोपाल व्रत कथा प्रारंभ 🪔

बहुत प्राचीन समय की बात है। द्वापर युग के अंतिम चरण में जब पृथ्वी पर अधर्म बढ़ने लगा था और अनेक राजा-महाराजा अपनी-अपनी संतानों के मोह में डूबकर धर्म से विमुख होने लगे थे, उसी समय पश्चिम दिशा में समुद्र तट के समीप एक अत्यंत समृद्ध और धार्मिक राज्य स्थित था। उस राज्य के राजा थे वीरसेन और उनकी पत्नी थीं रानी सुधामती। दोनों धर्मपरायण, दयालु और प्रजावत्सल थे। राज्य में सुख-समृद्धि की कोई कमी नहीं थी, प्रजा प्रसन्न थी, खेतों में अन्न लहलहाता था, गौशालाएँ दूध से भरी रहती थीं, और नगर में वेदों का नाद निरंतर सुनाई देता था।

किन्तु उस राजमहल के भीतर एक ऐसा शून्य था जो किसी भी ऐश्वर्य से नहीं भरता था — राजा और रानी संतानहीन थे।

वर्षों बीत गए। अनेक यज्ञ हुए, अनेक दान हुए, ब्राह्मणों को गौ, भूमि, स्वर्ण, वस्त्र सब दिया गया। तीर्थों की यात्रा की गई, देवताओं की आराधना की गई, किन्तु रानी की गोद सूनी ही रही। जैसे-जैसे समय बीतता गया, राजा का हृदय भीतर से टूटने लगा। वे रात्रि में सो नहीं पाते थे। राजसभा में बैठते तो भी मन उदास रहता। प्रजा से प्रेम करते थे, किन्तु भीतर एक पीड़ा चुभती रहती — “मेरे बाद इस राज्य का क्या होगा? मेरे कुल की परम्परा कैसे चलेगी?”

रानी सुधामती की अवस्था और भी करुण थी। वे हर दिन राजमहल के आँगन में खेलते बच्चों को देखतीं और मुस्कुरा देतीं, पर जैसे ही वे भीतर आतीं, अकेले कक्ष में जाकर रो पड़तीं। कई बार वे भगवान विष्णु की प्रतिमा के सामने बैठकर घंटों बात करतीं — “हे पालनहार, यदि मुझसे कोई अपराध हुआ हो तो दंड मुझे दो, पर मातृत्व से वंचित मत रखो।”

एक दिन महल में एक वृद्ध साधु आए। वे तेजस्वी थे, पर अत्यंत शांत। उनकी आँखों में करुणा और ज्ञान दोनों झलक रहे थे। राजा ने उनका सम्मानपूर्वक स्वागत किया और भोजन कराया। भोजन के पश्चात साधु ने स्वयं ही कहा — “राजन, तुम्हारे मन में भारी दुःख है। कहो, क्या पीड़ा है?”

राजा पहले तो मौन रहे, फिर उनके नेत्र भर आए। बोले — “भगवन्, राज्य है, वैभव है, यश है, पर संतान नहीं। सब कुछ होते हुए भी जीवन अधूरा है।”

साधु कुछ क्षण ध्यान में लीन रहे। फिर बोले — “तुम्हारा दुःख केवल इस जन्म का नहीं है। पूर्वजन्म में तुमने एक ब्राह्मण दम्पति को संतान के विषय में कठोर वचन कहे थे। उस कर्म का फल तुम आज भोग रहे हो। किन्तु निराश मत हो। भगवान श्रीकृष्ण स्वयं संतानों के रक्षक और दाता हैं। उनकी बाल-रूप में उपासना करने से बाँझ को भी पुत्र प्राप्त होता है, मृत पुत्र भी जीवित होता है, और कुल का विस्तार होता है।”

रानी की आँखों में आशा की चमक आ गई। उन्होंने हाथ जोड़कर कहा — “हे महात्मन्, हमें उपाय बताइए।”

साधु बोले — “द्वारका में श्रीकृष्ण के बाल-स्वरूप ‘संतान गोपाल’ की कृपा से असंभव भी संभव होता है। उनकी कथा का श्रवण और स्मरण करने मात्र से संतान की प्राप्ति होती है।”

इतना कहकर साधु ने एक प्राचीन प्रसंग सुनाना आरम्भ किया।

उन्होंने कहा — “द्वारका में एक ब्राह्मण रहता था। वह अत्यंत धर्मनिष्ठ था, पर उसका हर पुत्र जन्म लेते ही मर जाता था। जब पहला पुत्र मरा तो उसने इसे भाग्य माना। दूसरा मरा तो उसने प्रायश्चित किया। तीसरा मरा तो उसने तप किया। परन्तु जब नौ पुत्र लगातार जन्म लेकर मर गए, तब वह व्याकुल होकर राजसभा में गया और बोला — ‘राजा अधर्मी है, तभी ब्राह्मण के पुत्र जीवित नहीं रहते।’”

उस समय द्वारका में श्रीकृष्ण और अर्जुन उपस्थित थे। अर्जुन ने क्रोधित होकर कहा — “यदि अगला पुत्र भी मर गया तो मैं अपने गांडीव के साथ अग्नि में प्रवेश करूँगा।”

समय बीता, ब्राह्मण की पत्नी को पुनः प्रसव हुआ। अर्जुन स्वयं पहरा देने लगा। उसने चारों ओर दिव्य अस्त्रों का कवच बना दिया। देवता भी प्रवेश न कर सके। किन्तु जैसे ही बालक जन्मा, उसी क्षण अदृश्य होकर चला गया।

अर्जुन लज्जित हो गया। उसने अनेक लोकों में खोजा, यमलोक तक गया, पर बालक नहीं मिला। अंततः श्रीकृष्ण स्वयं उसे लेकर परमधाम गए जहाँ अनंत प्रकाश में भगवान नारायण विराजमान थे। वहीं ब्राह्मण के सभी पुत्र सुरक्षित थे।

भगवान ने कहा — “ये बालक मैंने इसलिए यहाँ रखे ताकि तुम दोनों मेरे दर्शन के लिए आओ।”

जब सभी पुत्र लौटाए गए, तब ब्राह्मण की वंश परंपरा सुरक्षित हुई।

साधु ने कथा समाप्त कर कहा — “राजन, वही बाल गोपाल संतान देने वाले हैं। श्रद्धा से उनकी कथा सुनो, उनके बाल-स्वरूप का स्मरण करो, तुम्हारी गोद अवश्य भरेगी।”

इतना कहकर साधु अदृश्य हो गए।

राजा और रानी ने उसी दिन से प्रतिदिन भगवान श्रीकृष्ण के बाल रूप का ध्यान करना आरम्भ किया। वे उन्हें अपने पुत्र की तरह पुकारते, उनसे बात करते, उन्हें सुलाते, उन्हें जगाते, उनसे शिकायत भी करते। धीरे-धीरे रानी का मन शांत होने लगा।

एक रात रानी ने स्वप्न देखा — एक नन्हा बालक नीले वर्ण का, पीताम्बर पहने, हाथ में माखन लिए मुस्कुरा रहा है। उसने आकर रानी की गोद में सिर रख दिया।

प्रातः होते ही रानी का मुख तेज से भर गया। कुछ दिनों बाद उन्हें गर्भधारण हुआ।

पूरा राज्य आनंदित हो उठा। नौ महीने तक राजा-रानी अत्यंत सावधानी से रहे। और एक शुभ नक्षत्र में एक सुंदर पुत्र का जन्म हुआ। उसके जन्म के साथ ही राजमहल में अद्भुत सुगंध फैल गई, आकाश में वीणा की ध्वनि सुनाई दी, और ब्राह्मणों ने कहा — “यह साधारण बालक नहीं, ईश्वर की कृपा है।”

राजा ने उसका नाम रखा — गोपाल।

बालक असाधारण था। वह हँसता तो सबका दुःख दूर हो जाता। वह रोता तो बादल घिर आते। गायें उसके पास स्वयं आकर खड़ी हो जातीं।

एक दिन वही वृद्ध साधु पुनः आए। उन्होंने बालक को देखकर कहा — “राजन, यह केवल तुम्हारा पुत्र नहीं, भगवान की कृपा का साक्षात प्रतीक है। इसका पालन धर्मपूर्वक करना।”

वर्षों बाद वह बालक महान राजा बना और उसके वंश ने लंबे समय तक धर्म की स्थापना की।

साधु ने राजा वीरसेन को यह कथा सुनाकर कहा — “जो इस बाल-कृष्ण की कथा श्रद्धा से सुनता है, उसके घर कभी संतानों का अभाव नहीं रहता।”

कथा समाप्त हुई।

राजा-रानी ने उसी भाव से भगवान का स्मरण जारी रखा। समय आया और रानी ने एक सुंदर पुत्र को जन्म दिया। उसके जन्म के समय भी वैसी ही दिव्य सुगंध फैली जैसी स्वप्न में आई थी। राजा समझ गए — यह बाल गोपाल की कृपा है।

उन्होंने घोषणा की — “जो भी संतान की इच्छा रखता है, वह भगवान के बाल स्वरूप की कथा सुने, विश्वास रखे, और कभी निराश न हो।”

तब से इस कथा का श्रवण करने से असंख्य दम्पत्तियों की गोद भरी, मृतप्राय शिशु जीवित हुए, और कुल परम्पराएँ चलती रहीं।

कहा जाता है, जहाँ यह कथा श्रद्धा से सुनी जाती है वहाँ स्वयं नंदलाल अदृश्य रूप में उपस्थित होकर आशीर्वाद देते हैं — “मैं ही प्रत्येक बालक में वास करता हूँ, जो मुझे पुत्र रूप में प्रेम करता है, मैं उसके जीवन में अवश्य आता हूँ।”

और यही कारण है कि आज भी भक्त विश्वास करते हैं कि बाल गोपाल केवल भगवान नहीं, हर माता-पिता के हृदय में जन्म लेने वाली आशा हैं, और जब मन सच्चा हो तो वे अवश्य गोद भरते हैं।


8️⃣ समापन 🙏

व्रत पूर्ण होने पर —

  • बाल गोपाल को नए वस्त्र पहनाएं
  • खीर का भोग लगाएं
  • बच्चों को प्रसाद दें
  • ब्राह्मण या छोटे बच्चों को भोजन कराएं

अंत में प्रार्थना करें —

हे नंदलाल! जिस प्रकार आपने यशोदा मैया का आँगन आनंद से भर दिया, उसी प्रकार हमारे जीवन में भी संतान सुख प्रदान करें।



🪔 कामदा व्रत कथा 🪔


1️⃣ मंगलाचरण 🙏

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
ॐ विष्णवे नमः ॥
शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशम्।
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्॥

हे भगवान श्रीहरि विष्णु 🙏
आप ही संसार के पालनकर्ता, पापों के नाशक और भक्तों के रक्षक हैं।
आपकी कृपा से यह कामदा एकादशी व्रत सफल हो।


2️⃣ परिचय 📖

  • व्रत नाम: कामदा एकादशी
  • माह: चैत्र मास शुक्ल पक्ष
  • देवता: भगवान विष्णु (विशेषतः श्रीकृष्ण रूप)
  • उद्देश्य: कामनाओं की पूर्ति और पापों से मुक्ति

यह वर्ष की प्रथम एकादशी मानी जाती है (हिंदू नववर्ष के बाद)।
"कामदा" का अर्थ — सभी इच्छाओं को पूर्ण करने वाली।

यह व्रत विशेष रूप से:

  • दोष निवारण
  • मानसिक शांति
  • संतान सुख
  • दाम्पत्य सुख के लिए किया जाता है।

3️⃣ शास्त्रीय आधार 📜

इस व्रत का वर्णन निम्न ग्रंथों में मिलता है —

  • विष्णु पुराण
  • भविष्य पुराण
  • पद्म पुराण (एकादशी माहात्म्य)
  • स्कन्द पुराण

शास्त्रों में कहा गया है:

एकादश्यां उपवासेन सर्वपापैः प्रमुच्यते
विष्णुलोकं स गच्छेत् नात्र कार्या विचारणा ॥

अर्थ — एकादशी उपवास करने वाला मनुष्य सभी पापों से मुक्त होकर विष्णु लोक को प्राप्त करता है।


4️⃣ पूजा विधि 🪔 


🕉️ प्रातःकाल

  1. ब्रह्म मुहूर्त में उठें
  2. स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें (पीले या सफेद)
  3. व्रत का संकल्प लें

संकल्प मंत्र:

मम सर्वपापक्षयपूर्वक सर्वाभीष्ट सिद्धये
श्रीविष्णुप्रीत्यर्थं कामदा एकादशी व्रतं करिष्ये ॥

🪷 पूजन सामग्री

  • पीला वस्त्र
  • तुलसी दल 🌿
  • पंचामृत
  • फल
  • धूप दीप
  • पीले फूल
  • भगवान विष्णु की मूर्ति/चित्र

🪔 पूजा प्रक्रिया

  1. चौकी पर पीला वस्त्र बिछाएँ
  2. भगवान विष्णु की स्थापना करें
  3. गंगाजल छिड़कें
  4. दीपक जलाएँ
  5. धूप अर्पित करें
  6. पंचामृत स्नान कराएँ
  7. पीले फूल अर्पित करें
  8. तुलसी दल अर्पित करें (अत्यंत आवश्यक)

📿 जप

  • ॐ नमो भगवते वासुदेवाय (108 बार)
  • विष्णु सहस्रनाम (यदि संभव हो)

🌙 रात्रि

  • भजन-कीर्तन करें
  • जागरण का विशेष महत्व

🌅 द्वादशी पारण

अगले दिन सूर्योदय के बाद व्रत खोलें
पहले ब्राह्मण या गाय को भोजन दें


5️⃣ व्रत का फल 🌟

शास्त्र अनुसार —

  • समस्त पाप नाश
  • अकाल मृत्यु से रक्षा
  • दाम्पत्य सुख
  • मनोकामना पूर्ति
  • पितृ दोष शांति
  • संतान प्राप्ति
  • मोक्ष की प्राप्ति

विशेष:
यह व्रत ब्रह्महत्या जैसे महापापों को भी नष्ट करने वाला बताया गया है।


6️⃣ नियम ⚠️


क्या करें ✔️

  • ब्रह्मचर्य पालन
  • सत्य बोलना
  • जप-पाठ
  • सात्विक भोजन (फलाहार)

क्या न करें ❌

  • चावल नहीं खाना
  • झूठ बोलना
  • क्रोध
  • निंदा
  • तामसिक भोजन
  • लहसुन-प्याज

विशेष नियम:
तुलसी का पत्ता बिना स्नान तोड़ना निषिद्ध है।


7️⃣🪔 कामदा व्रत कथा प्रारंभ 🪔

प्राचीन काल में भारतवर्ष के मध्य भाग में नागों और गंधर्वों से सुशोभित एक अत्यंत रमणीय और दिव्य नगरी थी, जिसका नाम रत्नपुर था। वह नगरी स्वर्ग के समान भव्य थी। वहाँ सैकड़ों उपवन, सुरभित पुष्पों की वाटिकाएँ, स्वच्छ जल से भरे सरोवर, संगीत की मधुर ध्वनियों से गूंजते राजमहल और हर समय उत्सव जैसा वातावरण रहता था। उस नगरी पर पुण्डरीक नाम का राजा राज्य करता था। वह अत्यंत तेजस्वी, पराक्रमी और विलक्षण कला-प्रेमी राजा था। उसे संगीत और नृत्य से विशेष अनुराग था और उसके दरबार में देवताओं के समान गंधर्व और अप्सराएँ नित्य गान-वादन प्रस्तुत करते थे।

राजसभा में अनेक गंधर्वों में से एक था ललित नाम का गंधर्व। उसका स्वर अत्यंत मधुर था और वीणा वादन में उसका कोई समकक्ष नहीं था। जब वह गाता, तो मानो वातावरण स्वयं थम जाता, पक्षी चुप हो जाते और हवा भी धीरे बहने लगती। ललित की पत्नी का नाम ललिता था। वह भी अनुपम सौंदर्य और कला की मूर्ति थी। पति-पत्नी दोनों में अत्यंत गहरा प्रेम था। वे एक दूसरे से क्षण भर भी दूर नहीं रह पाते थे। जहाँ ललित जाता, वहाँ ललिता की स्मृति रहती, और जहाँ ललिता होती, वहाँ ललित की छवि उसके हृदय में बसती।

एक दिन वसंत ऋतु का मधुर समय था। राजा पुण्डरीक के दरबार में विशेष संगीत सभा का आयोजन हुआ। अनेक गंधर्व, किन्नर और अप्सराएँ उपस्थित थीं। सभा में सुगंधित धूप जल रही थी, पुष्पों की वर्षा हो रही थी और वीणाओं की झंकार वातावरण को पवित्र बना रही थी। उसी समय ललित को गान प्रस्तुत करने का आदेश मिला। वह मंच पर पहुँचा, वीणा हाथ में ली और गाना प्रारम्भ किया, परंतु उस दिन उसका मन अस्थिर था। वह अपने घर से निकलते समय अपनी प्रिय पत्नी ललिता को अकेला छोड़ आया था और उसका हृदय उसी के विचारों में डूबा हुआ था। उसके स्वर में वह स्थिरता नहीं थी जो सदैव रहती थी। गीत के शब्द भी वह कई बार भूल गया।

राजसभा में एक नागराज भी उपस्थित था, जिसका नाम कर्कोटक था। वह अत्यंत सजग था। उसने ललित की असावधानी देखी और तुरंत राजा के कान में कहा कि गंधर्व का मन यहाँ नहीं, अपनी पत्नी में लगा है, इसीलिए वह राजसभा का अपमान कर रहा है। यह सुनते ही राजा पुण्डरीक क्रोधित हो उठा। उसके नेत्र लाल हो गए और उसने गर्जना करते हुए कहा कि जिसने राजसभा में कला का अपमान किया है, वह दंड का अधिकारी है।

क्रोध में आकर राजा ने ललित को शाप दे दिया कि वह तुरंत भयंकर राक्षस बन जाए। राजा के वचन सत्य होते ही उसी क्षण ललित का दिव्य स्वरूप नष्ट हो गया। उसका शरीर विशाल और विकराल हो गया, मुख से दाँत बाहर निकल आए, आँखें अग्नि के समान जलने लगीं, शरीर पर बाल उग आए और वह भयंकर राक्षस बनकर वहाँ से वन की ओर भाग गया। उसकी गर्जना सुनकर सभा में उपस्थित सभी भयभीत हो गए।

जब यह समाचार ललिता को मिला, तो उसका हृदय टूट गया। वह रोती हुई वन-वन भटकने लगी। उसने अपने सुन्दर आभूषण त्याग दिए, केश बिखर गए और वह केवल एक ही पुकार करती रही — “हे स्वामी, आप कहाँ चले गए?” वह दिन-रात अपने पति को खोजती रही। कभी पर्वतों पर जाती, कभी नदियों के किनारे, कभी अरण्य के भीतर, परंतु उसे केवल जंगली पशुओं की आवाजें सुनाई देतीं।

एक दिन गहन वन में उसने दूर से एक भयंकर राक्षस को देखा। पहले वह भयभीत हुई, परंतु जब उसने ध्यान से देखा, तो उसके हृदय ने पहचान लिया कि यह कोई और नहीं, उसका अपना प्रिय पति है। वह रोती हुई उसके पास पहुँची। राक्षस रूप में ललित भी अपनी पत्नी को पहचान गया, परंतु वह कुछ बोल नहीं पा रहा था। उसका विकराल शरीर और भयंकर स्वरूप उसे असहाय बना चुका था। दोनों की आँखों से अश्रु बहने लगे।

ललिता ने निश्चय किया कि वह अपने पति को इस दुःख से मुक्त कराएगी। वह तपस्वियों और ऋषियों की खोज में निकल पड़ी। कई दिनों तक चलने के बाद वह विंध्याचल पर्वत पर पहुँची, जहाँ महान तपस्वी श्रृंगी ऋषि का आश्रम था। आश्रम अत्यंत शांत था। वहाँ वेदों की ध्वनि गूँज रही थी और ऋषि ध्यान में लीन थे।

ललिता ने उनके चरणों में गिरकर अपने पति की पूरी कथा सुनाई। उसकी आँखों से आँसू रुक नहीं रहे थे। उसने कहा कि वह अपने पति को मुक्त कराना चाहती है और इसके लिए वह कुछ भी करने को तैयार है।

ऋषि श्रृंगी ने ध्यान लगाकर दिव्य दृष्टि से सब देखा और बोले कि तुम्हारे पति को राजशाप के कारण राक्षस योनि मिली है, परंतु इसका उपाय है। उन्होंने कहा कि चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का व्रत अत्यंत पवित्र है, जिसका नाम कामदा एकादशी है। इसके प्रभाव से बड़े-बड़े पाप और शाप नष्ट हो जाते हैं। यदि तुम श्रद्धा और भक्ति से उस दिन भगवान विष्णु का स्मरण कर उपवास रखो और उसका पुण्य अपने पति को अर्पित करो, तो वह तुरंत मुक्त हो जाएगा।

ललिता ने प्रण किया कि वह पूर्ण विश्वास से यह व्रत करेगी। एकादशी का दिन आया। उसने नदी में स्नान किया, मन को शुद्ध किया और दिन-रात भगवान विष्णु का ध्यान करती रही। उसने अन्न-जल का त्याग किया और पूरी रात जागरण करते हुए भगवान के नाम का स्मरण करती रही। उसका मन केवल एक ही प्रार्थना कर रहा था कि उसके पति का उद्धार हो जाए।

प्रातःकाल द्वादशी के समय उसने भगवान से प्रार्थना कर अपने व्रत का पुण्य अपने पति को समर्पित किया। उसी क्षण अद्भुत चमत्कार हुआ। दूर वन में जो भयंकर राक्षस भटक रहा था, उसका शरीर तेजस्वी होने लगा। उसका विकराल रूप समाप्त हो गया और वह पुनः दिव्य गंधर्व रूप में प्रकट हो गया। उसके शरीर से प्रकाश निकलने लगा और वह अत्यंत सुंदर बन गया।

ललित तुरंत अपनी पत्नी के पास पहुँचा। दोनों एक दूसरे को देखकर भावविभोर हो गए। उन्होंने भगवान की स्तुति की और ऋषि श्रृंगी के चरणों में कृतज्ञता प्रकट की। आकाश से पुष्पवृष्टि होने लगी और दिव्य ध्वनि हुई कि कामदा एकादशी का प्रभाव असीम है, यह शापों का नाश कर जीव को सुख प्रदान करती है।

दोनों पति-पत्नी पुनः अपने लोक को लौट गए और वहाँ सबको इस व्रत की महिमा सुनाई। कहा जाता है कि जो भी इस कथा को श्रद्धा से सुनता है, उसके जीवन के पाप और दुःख दूर होते हैं और मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं। इस प्रकार प्रेम, विश्वास और भक्ति की शक्ति से ललिता ने अपने पति को पुनः प्राप्त किया और संसार में यह व्रत महान माना गया।


8️⃣ समापन 🙏

अनया पूजया श्रीविष्णुः प्रीयताम् ॥
व्रतस्यास्य समाप्तौ मम सर्वमङ्गलं भवतु ॥

हे भगवान विष्णु 🙏
इस कामदा एकादशी व्रत से प्रसन्न होकर मेरी सभी मनोकामनाएँ पूर्ण करें,
सदैव धर्म मार्ग पर चलने की शक्ति दें।



🪔 सौभाग्य व्रत कथा 🪔


1️⃣ मंगलाचरण 🙏

|| ॐ श्री गणेशाय नमः ||
|| ॐ नमः शिवाय ||
|| ॐ गौर्यै नमः ||

हे माता पार्वती! आप अखण्ड सौभाग्य प्रदान करने वाली हैं,
हम श्रद्धा-भक्ति से इस व्रत का पालन करें — ऐसी कृपा करें।


2️⃣ परिचय 🪔

सौभाग्य व्रत मुख्य रूप से स्त्रियों द्वारा पति की दीर्घायु, दाम्पत्य सुख, अखण्ड सौभाग्य और पारिवारिक समृद्धि के लिए किया जाता है।

  • यह व्रत माता पार्वती (गौरी) को समर्पित है
  • विशेष रूप से विवाहित महिलाएँ करती हैं
  • कुछ स्थानों पर कन्याएँ भी उत्तम पति प्राप्ति हेतु करती हैं
  • यह व्रत सौभाग्य, श्रृंगार, वैवाहिक सुख और ग्रह शांति से जुड़ा माना गया है

📅 यह व्रत सामान्यतः शुक्रवार या शुभ तिथि (विशेषकर शुक्ल पक्ष) में किया जाता है।


3️⃣ शास्त्रीय आधार 📜

सौभाग्य व्रत का उल्लेख विभिन्न ग्रंथों में स्त्री-धर्म और सौभाग्य-प्राप्ति व्रतों के अंतर्गत आता है:

  • स्कन्द पुराण – गौरी उपासना द्वारा अखण्ड सौभाग्य
  • पद्म पुराण – पति-सुख हेतु पार्वती पूजन
  • शिव पुराण – शिव-पार्वती पूजन से दाम्पत्य सिद्धि
  • धर्मशास्त्र (व्रतखण्ड) – सौभाग्यकारक व्रतों का विधान

शास्त्रों के अनुसार
👉 गौरी पूजन = पति की आयु + वैवाहिक स्थिरता + कुल वृद्धि


4️⃣ पूजा विधि 🪷


प्रातः तैयारी

  • ब्रह्म मुहूर्त में उठें
  • स्नान कर लाल/पीले वस्त्र पहनें
  • हाथ में जल लेकर संकल्प लें

संकल्प मंत्र
“मैं अमुक नाम, अपने पति की दीर्घायु एवं अखण्ड सौभाग्य हेतु सौभाग्य व्रत का पालन कर रही हूँ।”


पूजन सामग्री

  • माता पार्वती की मूर्ति/चित्र
  • हल्दी, कुमकुम, सिंदूर
  • चूड़ी, बिंदी, कंघी, मेहँदी
  • लाल वस्त्र
  • पुष्प (लाल विशेष)
  • अक्षत
  • धूप, दीप
  • नैवेद्य (मिठाई/फल)
  • पान सुपारी
  • श्रृंगार सामग्री

पूजन क्रम

  1. आसन पर माता गौरी स्थापित करें
  2. जल से आचमन एवं शुद्धि
  3. गणेश पूजन
  4. कलश स्थापना
  5. माता पार्वती का आवाहन
  6. श्रृंगार अर्पण (मुख्य भाग)
    • सिंदूर
    • चूड़ी
    • बिंदी
    • कंघी
    • मेहँदी
  7. पुष्प अर्पण
  8. धूप-दीप प्रज्वलित करें
  9. नैवेद्य अर्पित करें
  10. आरती करें

5️⃣ फल 🌸

शास्त्रों के अनुसार इस व्रत से:

  • पति की आयु में वृद्धि
  • दाम्पत्य जीवन में प्रेम
  • वैवाहिक कलह समाप्त
  • सुहाग की रक्षा
  • घर में लक्ष्मी का वास
  • संतान सुख
  • मानसिक शांति
  • ग्रह दोष शमन

👉 इसे अखंड सौभाग्य प्रदान करने वाला व्रत कहा गया है।


6️⃣ नियम 📿

  • व्रत दिन ब्रह्मचर्य पालन
  • असत्य व क्रोध त्याग
  • बाल-नाखून न काटें
  • काले वस्त्र न पहनें
  • पति का अपमान न करें
  • भोजन सात्विक लें
  • नमक रहित या एक समय भोजन (परम्परा अनुसार)
  • रात्रि में भगवान शिव-पार्वती स्मरण

7️⃣🪔 सौभाग्य व्रत कथा प्रारंभ 🪔

एक समय कैलाश पर्वत पर भगवान शिव और माता पार्वती विराजमान थे। चारों ओर हिम की उज्ज्वल आभा फैली हुई थी, मंद पवन देवदार के वृक्षों को स्पर्श करती हुई बह रही थी और गंधर्व मधुर गीत गा रहे थे। उसी समय माता पार्वती ने नीचे पृथ्वी लोक की ओर दृष्टि डाली। उन्होंने देखा कि संसार की स्त्रियाँ अनेक प्रकार के दुखों से घिरी हुई हैं—कहीं पति का अल्पायु होना, कहीं दांपत्य में कलह, कहीं निर्धनता और कहीं संतान का अभाव। कई स्त्रियाँ विधवा होकर जीवन भर कष्ट भोग रही थीं। यह सब देखकर माता का हृदय करुणा से भर उठा।

माता ने भगवान शिव से पूछा, “हे नाथ, ये स्त्रियाँ अपने भाग्य को कोसती रहती हैं, वे सुखी वैवाहिक जीवन और अखंड सौभाग्य की कामना करती हैं, परंतु उन्हें मार्ग ज्ञात नहीं। क्या कोई ऐसा व्रत या उपाय है जिससे उनका दांपत्य सुखी रहे और उन्हें अखंड सौभाग्य प्राप्त हो?”

भगवान शिव मुस्कुराए और बोले, “हे देवी, तुम स्वयं जगत जननी हो, तुम्हारी करुणा ही संसार का पालन करती है। एक ऐसा पवित्र व्रत है जिसे करने से स्त्री को अखंड सौभाग्य, सुखी पति, संतति, समृद्धि और मान–सम्मान सब कुछ प्राप्त होता है। यह सौभाग्य व्रत है। इसकी कथा अत्यंत पुण्यदायक है, सुनने मात्र से पाप नष्ट होते हैं। मैं तुम्हें इसका प्राचीन प्रसंग सुनाता हूँ।”

बहुत समय पहले अवन्ती नगरी में धर्मशील नाम का एक ब्राह्मण रहता था। वह वेदों का ज्ञाता था, परंतु अत्यंत निर्धन था। उसकी पत्नी सती नाम की पतिव्रता स्त्री थी। दोनों का जीवन कठिनाई में बीतता था, फिर भी वे ईश्वर में अटूट विश्वास रखते थे। उनके घर में भोजन के लिए कभी-कभी अन्न भी नहीं होता, पर सती अपने पति की सेवा में कभी कमी नहीं करती थी। वह सदा प्रसन्न रहती और पति को देवतुल्य मानती।

एक दिन धर्मशील वन में लकड़ियाँ लाने गया। अचानक वहाँ एक विषधर सर्प ने उसे डस लिया। कुछ ही क्षणों में उसका शरीर निर्जीव होकर भूमि पर गिर पड़ा। जब शाम तक वह घर नहीं लौटा तो सती व्याकुल होकर उसे खोजने निकली। बहुत देर बाद उसने अपने पति को मृत अवस्था में पाया। उस समय उसके हृदय का धैर्य टूट गया, पर उसने विलाप करने के स्थान पर भगवान का स्मरण किया और पति के चरणों से लिपटकर बोली, “हे प्रभु, यदि मेरा पतिव्रत सच्चा है तो मेरे पति को जीवन दीजिए।”

उसके आँसुओं से भूमि भी भीग गई। तभी वहाँ से कुछ देवकन्याएँ आकाश मार्ग से जा रही थीं। उन्होंने उस पतिव्रता का विलाप सुना और उसके सामने प्रकट हुईं। सती ने उन्हें प्रणाम किया और अपनी पीड़ा बताई। देवकन्याएँ बोलीं, “हे सती, तुम्हारा पतिव्रत महान है, परंतु पूर्व जन्म के कर्मों से यह संकट आया है। यदि तुम सौभाग्य व्रत का संकल्प लेकर भगवान शिव और माता गौरी का स्मरण करोगी तो तुम्हारे पति को जीवन मिल सकता है।”

सती ने पूछा, “देवी, वह व्रत कैसा है? मुझे कुछ भी ज्ञात नहीं, मैं तो एक साधारण स्त्री हूँ।”

देवकन्याएँ बोलीं, “श्रद्धा ही सबसे बड़ा नियम है। मन, वचन और कर्म से पति को ईश्वर मानकर, पार्वती जी का स्मरण कर, अपने पुण्य का दान पति के जीवन के लिए अर्पित करो। कथा का श्रवण करो और अखंड सौभाग्य की कामना करो।”

सती ने वहीं बैठकर आँखे बंद कीं और माता पार्वती को स्मरण किया। उसने मन ही मन कहा, “हे जगत जननी, मैं अज्ञानिनी हूँ, मुझे विधि नहीं आती, मंत्र नहीं आते, पर मेरा प्रेम सच्चा है। मेरे पति को जीवन दो, मैं तुम्हें अपना सब कुछ अर्पित करती हूँ।”

उसके संकल्प की शक्ति इतनी प्रबल थी कि कैलाश तक पहुँची। माता पार्वती ने भगवान शिव से कहा, “नाथ, देखिए इस स्त्री का प्रेम कितना पवित्र है।” शिव बोले, “देवी, यही सच्चा सौभाग्य है। विधि से अधिक भाव श्रेष्ठ होता है।”

उसी क्षण एक दिव्य प्रकाश वहाँ प्रकट हुआ और सर्प का विष नष्ट हो गया। धर्मशील ने धीरे-धीरे आँखें खोलीं। सती की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उसने पति के चरणों में सिर रख दिया। धर्मशील को कुछ भी स्मरण नहीं था, पर उसने अपनी पत्नी के तेज को देखकर समझ लिया कि यह किसी महान पुण्य का फल है।

दोनों घर लौट आए। धीरे-धीरे उनके जीवन में परिवर्तन आने लगा। पहले जहाँ निर्धनता थी, वहाँ समृद्धि आने लगी। लोगों ने धर्मशील को सम्मान देना शुरू किया। उनके घर में अन्न, वस्त्र और धन सब आने लगा। वे प्रसन्नतापूर्वक जीवन बिताने लगे।

उसी नगर में एक धनी सेठ की पत्नी थी—मालिनी। वह अत्यंत अभिमानी थी और सती का उपहास करती थी। एक दिन उसने पूछा, “तुम तो निर्धन थी, अचानक इतना वैभव कैसे आ गया?”

सती ने विनम्रता से पूरी घटना बताई और सौभाग्य व्रत की महिमा कही। पर मालिनी ने इसे अंधविश्वास कहकर हँसी उड़ाई। उसने कहा, “भाग्य कर्म से बदलता है, इन बातों से नहीं।”

समय बीता। एक दिन सेठ व्यापार के लिए दूर देश गया और लौटकर नहीं आया। कई वर्ष बीत गए। मालिनी का धन भी समाप्त होने लगा। रिश्तेदारों ने साथ छोड़ दिया। तब उसे सती की बात याद आई। वह रोती हुई उसके पास आई और बोली, “बहन, मैंने तुम्हारा अपमान किया, मुझे क्षमा करो। अब मुझे मार्ग बताओ।”

सती ने उसे गले लगाया और कहा, “दुख में जो ईश्वर को पुकारे वही सच्चा भक्त होता है। श्रद्धा रखो, माता अवश्य कृपा करेंगी।”

मालिनी ने मन से प्रार्थना की। कुछ समय बाद समाचार मिला कि उसका पति जीवित है और वापस लौट रहा है। वह समुद्री तूफान में फँस गया था, पर चमत्कार से बच गया। घर लौटकर उसने बताया कि जब वह डूब रहा था तब एक तेजस्विनी स्त्री ने उसे बचाया। वह माता पार्वती थीं।

मालिनी का अभिमान नष्ट हो गया। उसने सती के चरण पकड़ लिए। उस दिन से नगर की सभी स्त्रियाँ सौभाग्य की कामना से ईश्वर का स्मरण करने लगीं।

भगवान शिव ने कथा समाप्त करते हुए पार्वती से कहा, “हे देवी, यह व्रत केवल क्रिया नहीं, भावना है। जो स्त्री सच्चे मन से पति के कल्याण की कामना करती है, उसका सौभाग्य अटूट रहता है।”

माता पार्वती प्रसन्न हुईं और बोलीं, “आज से जो भी स्त्री इस कथा को श्रद्धा से सुनेगी या सुनाएगी, उसका वैवाहिक जीवन सुखमय रहेगा, उसके पति की रक्षा होगी और परिवार में समृद्धि आएगी।”

तभी आकाश से पुष्प वर्षा हुई और देवताओं ने माता पार्वती की स्तुति की। उस दिन से यह कथा पृथ्वी पर फैल गई। स्त्रियाँ इसे सुनकर धैर्य, प्रेम और विश्वास का महत्व समझने लगीं। उन्हें ज्ञात हुआ कि सौभाग्य केवल आभूषण या वस्त्र से नहीं, बल्कि त्याग, श्रद्धा और अटूट विश्वास से मिलता है।

कालांतर में एक अन्य नगर में ललिता नाम की कन्या रहती थी। उसका विवाह हुआ, पर उसका पति अत्यंत क्रोधी था। वह बात-बात पर उसे अपमानित करता। ललिता दुखी रहती, पर उसने कभी विरोध नहीं किया। वह मन ही मन माता पार्वती का स्मरण करती और अपने दांपत्य को बचाने की प्रार्थना करती।

एक दिन उसके पति को गंभीर रोग हो गया। वैद्य हार गए। तब ललिता ने पति के सिरहाने बैठकर रात भर भगवान शिव और पार्वती का स्मरण किया। उसने कहा, “यदि मेरे मन में छल नहीं, तो मेरे पति स्वस्थ हों।”

सुबह होते ही रोग शांत होने लगा। पति को जैसे नया जीवन मिला। उसे अपने व्यवहार पर पश्चाताप हुआ। उसने पत्नी से क्षमा माँगी और कहा, “मैंने तुम्हें दुख दिया, पर तुमने मेरे लिए प्रार्थना की।”

ललिता मुस्कुराई और बोली, “पति ही मेरा देवता है, उसका कल्याण ही मेरा सुख है।”

उस दिन से उनका जीवन प्रेम से भर गया। यह समाचार पूरे नगर में फैल गया और लोग समझ गए कि सच्चा सौभाग्य प्रेम और विश्वास से उत्पन्न होता है।

इस प्रकार युगों से यह कथा स्त्रियों को धैर्य, त्याग और श्रद्धा का संदेश देती रही। माता पार्वती की कृपा से असंख्य परिवारों में सुख स्थापित हुआ, अनेक पतियों को संकट से मुक्ति मिली और स्त्रियों को सम्मान मिला। जो स्त्री इसे सुनती, उसके मन में विश्वास जागता कि सच्चे प्रेम और आस्था से भाग्य भी बदला जा सकता है।

कैलाश पर यह कथा सुनाने के बाद भगवान शिव ने पार्वती की ओर देखा। उनके नेत्रों में करुणा और संतोष था। उन्होंने कहा, “हे देवी, तुम्हारी प्रेरणा से यह ज्ञान संसार में जाएगा और गृहस्थ जीवन धर्ममय बनेगा।”

माता पार्वती ने संसार की स्त्रियों को आशीर्वाद दिया—“तुम्हारा प्रेम अडिग रहे, तुम्हारा विश्वास अटल रहे, और तुम्हारा सौभाग्य अखंड रहे।”

तभी से यह कथा लोक में प्रचलित हुई और स्त्रियाँ इसे सुनकर अपने जीवन में धैर्य, समर्पण और विश्वास का दीप जलाती रहीं। यही सौभाग्य का सच्चा रहस्य है—जहाँ प्रेम है, वहाँ ईश्वर स्वयं निवास करते हैं, और जहाँ ईश्वर हैं वहाँ कभी दुर्भाग्य नहीं ठहरता।


8️⃣ समापन 🌼

संध्या समय पुनः दीप जलाकर माता गौरी की आरती करें।
सौभाग्य सामग्री सुहागिन स्त्री को दान दें (विशेष फलदायी)।

प्रार्थना हे माता गौरी!
मेरे सौभाग्य की रक्षा करें,
मेरे परिवार में सुख-शांति बनाए रखें
और पति को दीर्घ आयु प्रदान करें।

|| ॐ शांति शांति शांति ||



🪔 कल्याण व्रत कथा 🪔


1️⃣ मंगलाचरण 🙏

व्रत आरम्भ करने से पहले श्रद्धा-पूर्वक ईश्वर स्मरण करें —

ॐ श्री गणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
ॐ सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके ।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणि नमोऽस्तुते ॥

भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी और कुलदेवता का ध्यान कर संकल्प लें कि यह व्रत परिवार के कल्याण, सुख-समृद्धि और दोष शांति हेतु किया जा रहा है।


2️⃣ परिचय 📜

कल्याण व्रत एक सार्वभौमिक शुभफलदायक व्रत माना गया है।
इसका उद्देश्य है —

  • ग्रह बाधा शांति 🪐
  • परिवार में सुख-शांति 🏡
  • धन-वृद्धि 💰
  • रोग-निवारण 🩺
  • मानसिक संतुलन 🧘

यह व्रत विशेष रूप से भगवान विष्णु-लक्ष्मी की कृपा प्राप्त करने के लिए किया जाता है।
स्त्री-पुरुष दोनों कर सकते हैं तथा यह किसी भी शुभ तिथि, गुरुवार, एकादशी या पूर्णिमा से आरम्भ करना श्रेष्ठ माना जाता है।


3️⃣ शास्त्रीय आधार 📖

धर्मशास्त्रों में “कल्याण” शब्द का अर्थ है — सम्पूर्ण मंगल एवं दोषों का नाश

पुराणों के अनुसार —

  • विष्णु पूजा से जीवन के त्रिविध ताप (दैहिक-दैविक-भौतिक) शांत होते हैं
  • लक्ष्मी पूजन से अभाव और दरिद्रता दूर होती है
  • व्रत, दान और संयम से पाप क्षय होता है

अतः यह व्रत समग्र शांति साधन व्रत की श्रेणी में आता है —
जिसमें उपवास + जप + दान + संयम = कल्याण


4️⃣ पूजा विधि 🪔


🧹 (1) पूर्व तैयारी

  • प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनें (पीले/सफेद श्रेष्ठ)
  • पूजा स्थान शुद्ध करें
  • चौकी पर पीला वस्त्र बिछाएँ

🪷 (2) स्थापना

चौकी पर स्थापित करें —

  • भगवान विष्णु या लक्ष्मी-नारायण चित्र/प्रतिमा
  • कलश (जल, आम्रपल्लव, नारियल सहित)
  • दीपक (घी का)
  • धूप, पुष्प, अक्षत, तुलसी दल

🪔 (3) संकल्प

दाहिने हाथ में जल, अक्षत, पुष्प लेकर संकल्प मंत्र —

“मैं अमुक नाम, अपने एवं परिवार के कल्याण, आरोग्य, सुख-समृद्धि और दोष निवारण हेतु कल्याण व्रत का संकल्प करता/करती हूँ।”

जल भूमि में छोड़ दें।


🌼 (4) पूजन क्रम

  1. गणेश पूजन
  2. कलश पूजन
  3. विष्णु-लक्ष्मी पूजन
  4. तुलसी अर्पण
  5. दीप-धूप अर्पण
  6. नैवेद्य (फल/मिष्ठान)
  7. आरती

🔔 (5) मंत्र जप

कम से कम 108 बार —

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
या
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै नमः


🍎 (6) व्रत आहार

  • दिनभर फलाहार या एक समय सात्विक भोजन
  • लहसुन-प्याज, तामसिक भोजन वर्जित

5️⃣ फल

शास्त्रानुसार इस व्रत से प्राप्त होते हैं —

  • दरिद्रता नाश 💰
  • गृहकलह शांति 🏡
  • रोग शमन 🩺
  • कार्य सिद्धि 📈
  • मानसिक शांति 🧘
  • संतान सुख 👶
  • भाग्योदय 🌟

नियमित करने से जीवन में स्थिर सुख और सुरक्षा की भावना आती है।


6️⃣ नियम 📏

व्रत के दौरान विशेष ध्यान रखें —

  • असत्य भाषण न करें
  • क्रोध न करें 😠
  • किसी का अपमान न करें
  • ब्रह्मचर्य व संयम रखें
  • दान अवश्य करें (अन्न/वस्त्र)
  • सूर्यास्त बाद तामसिक भोजन न लें
  • व्रत दिवस पर परनिंदा वर्जित

7️⃣🪔 कल्याण व्रत कथा प्रारंभ 🪔

प्राचीन काल में अवन्तीपुरी नाम की एक विशाल और समृद्ध नगरी थी। वहाँ धर्मपाल नाम का एक न्यायप्रिय और प्रजावत्सल राजा राज्य करता था। उसके राज्य में अन्न, जल, धन और सुख की कोई कमी नहीं थी, फिर भी राजा के हृदय में सदा एक अदृश्य चिंता बनी रहती थी। कारण यह था कि राजमहल में वैभव होने पर भी उसके परिवार में शांति नहीं थी। रानी सौभाग्यवती अत्यन्त धर्मपरायण थी, परंतु संतान बार-बार जन्म लेकर कुछ ही दिनों में मृत्यु को प्राप्त हो जाती। महल में उत्सव की तैयारी होती, शंख बजते, वेदपाठ होता, और फिर अचानक शोक छा जाता। इस प्रकार वर्षों बीत गए।

एक रात राजा ने स्वप्न में देखा कि वह विशाल अंधकारमय वन में अकेला भटक रहा है। चारों ओर से शिशुओं के रोने की ध्वनि आ रही है, पर वह किसी को देख नहीं पा रहा। तभी आकाश से दिव्य प्रकाश उतरा और एक वृद्ध ब्राह्मण प्रकट हुए। उन्होंने कहा — “राजन, तुम्हारा वैभव अधूरा है क्योंकि तुम्हारे पूर्व जन्म का एक अधर्म आज भी तुम्हें बाँधे हुए है। तुमने एक समय किसी साधु के कल्याण को रोक दिया था, उसी कारण तुम्हारे कुल का कल्याण बाधित है। जब तक तुम ‘कल्याण व्रत’ का श्रवण और स्मरण नहीं करोगे, तुम्हें शांति नहीं मिलेगी।”

राजा घबराकर उठ बैठा। उसने उसी समय ब्राह्मणों को बुलाया और स्वप्न का अर्थ पूछा, पर किसी को भी इस व्रत का पूरा ज्ञान नहीं था। तभी महल के द्वार पर एक अति वृद्ध संन्यासी आए, जिनके नेत्रों में करुणा और तेज साथ-साथ झलक रहा था। उन्होंने कहा — “राजन, जो व्रत समस्त जीवों के मंगल और आत्मा के शुद्ध संकल्प से किया जाए, वही कल्याण व्रत कहलाता है। इसका मूल रहस्य एक प्राचीन कथा में छिपा है, जिसे सुनने मात्र से भी जीवन के पाप क्षीण होते हैं।”

राजा ने हाथ जोड़कर उनसे कथा सुनाने की प्रार्थना की।

संन्यासी बोले — “सृष्टि के आरम्भ में जब पृथ्वी नवयौवना थी और मनुष्य धर्म के मार्ग पर चलता था, तब मेरु पर्वत के समीप तपोवन में एक ऋषि रहते थे जिनका नाम विभांडक था। वे अत्यन्त तेजस्वी थे, पर उनका पुत्र कश्यप बाल्यकाल से ही भोगों की ओर आकर्षित था। पिता बार-बार समझाते कि मनुष्य जन्म का उद्देश्य आत्मकल्याण है, पर युवक को राज्य, वैभव और शक्ति की चाह थी। एक दिन वह पिता को छोड़कर नगर चला गया।

नगर में उसने परिश्रम कर धन कमाया, व्यापार बढ़ाया और धीरे-धीरे बड़ा धनिक बन गया। धन आने के साथ उसका हृदय कठोर हो गया। वह किसी याचक को दान नहीं देता, किसी दुखी की सहायता नहीं करता। उसे लगता कि जो कुछ उसने पाया है वह केवल उसके परिश्रम का फल है। एक दिन नगर में भीषण अकाल पड़ा। लोग भूख से तड़पने लगे। बच्चे रोते, वृद्ध गिरते, स्त्रियाँ विलाप करतीं, पर कश्यप अपने अन्नागार बंद करके बैठा रहा। उसने पहरेदारों को आदेश दिया कि कोई भी भिक्षुक उसके द्वार तक न आए।

उसी समय एक साधु उसके द्वार पर पहुँचे। वे अत्यन्त कृशकाय थे और तीन दिनों से भूखे थे। उन्होंने जल और अन्न की याचना की। कश्यप ने क्रोध में कहा — “मेरे अन्न पर मेरा अधिकार है, मैं इसे व्यर्थ नहीं बाँटूँगा।” साधु ने शांत स्वर में कहा — “धन का अर्थ संचय नहीं, प्रवाह है। जो दूसरों के कल्याण को रोकता है, उसका अपना कल्याण भी रुक जाता है।” पर कश्यप ने उनकी बात का उपहास किया और उन्हें अपमानित कर भगा दिया।

साधु ने जाते-जाते आकाश की ओर देखकर कहा — “हे ईश्वर, इस जीव को अनुभव द्वारा शिक्षा देना।” उसी क्षण से कश्यप का भाग्य बदल गया। उसका व्यापार डूबने लगा, धन चोरी हो गया, और कुछ ही महीनों में वह निर्धन हो गया। मित्र दूर हो गए, सेवक छोड़कर चले गए। अंततः वह उसी मार्ग पर भिक्षा माँगने को विवश हुआ जहाँ कभी वह घमंड से चलता था।

भूख और अपमान से पीड़ित होकर वह वन में भटकते-भटकते एक आश्रम पहुँचा। वहाँ उसके पिता विभांडक ऋषि तप में लीन थे। कश्यप उनके चरणों में गिर पड़ा और रोते हुए अपने पाप स्वीकार किए। ऋषि ने करुणा से कहा — “पुत्र, संसार में सबसे बड़ा पाप किसी के कल्याण में बाधा डालना है। तुमने जिस साधु को अन्न नहीं दिया, वही वास्तव में स्वयं भगवान का रूप था। अब प्रायश्चित का एक ही उपाय है — दूसरों के सुख की कामना कर जीवन बिताओ।”

ऋषि उसे लेकर उस स्थान पर गए जहाँ वह साधु मिला था। वहाँ एक दिव्य ज्योति प्रकट हुई और वही साधु भगवान विष्णु के स्वरूप में दिखाई दिए। कश्यप भय और श्रद्धा से काँप उठा। भगवान ने कहा — “मैंने तुम्हें दंड नहीं, अनुभव दिया है। जब मनुष्य केवल अपने लिए जीता है तो उसका जीवन बंधन बन जाता है, और जब वह सबके कल्याण की कामना करता है तो वही मुक्ति का मार्ग है। जो भी इस भाव से जीवन बिताए और इस कथा को स्मरण करे, उसका कुल और मन दोनों पवित्र होते हैं।”

कश्यप ने उसी दिन से संकल्प किया कि वह अपना जीवन लोककल्याण में लगाएगा। उसने वन में अन्नक्षेत्र बनाया, यात्रियों के लिए जल की व्यवस्था की, और बीमारों की सेवा करने लगा। धीरे-धीरे उसका हृदय निर्मल हो गया। वर्षों बाद भगवान पुनः प्रकट हुए और बोले — “अब तुम्हारा अंतःकरण शुद्ध है, तुम्हारा और तुम्हारे कुल का कल्याण हो चुका।” उसी क्षण उसका शरीर दिव्य प्रकाश में विलीन हो गया।

संन्यासी ने आगे कहा — “राजन, यही वह कथा है जिसे सुनना और दूसरों को सुनाना कल्याण व्रत का सार है। इसका तात्पर्य बाहरी क्रिया नहीं, बल्कि हृदय का परिवर्तन है।”

राजा धर्मपाल ने यह कथा सुनकर अपने जीवन का पुनर्विचार किया। उसे स्मरण हुआ कि युवावस्था में उसने युद्ध में एक आश्रम उजाड़ दिया था और साधुओं को वहाँ से हटवा दिया था क्योंकि उसे वहाँ किला बनाना था। वही उसका अधर्म था। उसने तुरंत उस स्थान को पुनः आश्रम के लिए समर्पित कर दिया और स्वयं जाकर साधुओं से क्षमा माँगी।

कुछ समय बाद रानी को पुत्र प्राप्त हुआ और वह जीवित रहा। महल में उत्सव हुआ, पर राजा का हृदय पहले से अधिक विनम्र था। उसने राज्य में अन्नक्षेत्र, जलसेतु और चिकित्सालय बनवाए। प्रजा का दुख देखकर वह स्वयं सहायता करता। उसके राज्य में रोग कम हुए, कलह मिटा और लोग परस्पर सहयोग से रहने लगे।

वर्षों बाद वही संन्यासी पुनः आए। उन्होंने कहा — “राजन, अब तुम्हारे राज्य का ही नहीं, तुम्हारे मन का भी कल्याण हो चुका है।” उसी क्षण आकाश में शंखध्वनि हुई और दिव्य पुष्पवृष्टि होने लगी। राजा ने समझ लिया कि सच्चा सुख भोग में नहीं, सबके मंगल में है।

संन्यासी बोले — “जो मनुष्य इस कथा को श्रद्धा से सुनता या सुनाता है, उसके जीवन की बाधाएँ धीरे-धीरे दूर होती हैं। उसके घर में शांति आती है, संतान सुख मिलता है और अंत में उसे आत्मिक संतोष प्राप्त होता है। क्योंकि जब मनुष्य दूसरों के सुख को अपना सुख मान लेता है, तब ही सच्चा कल्याण प्रारम्भ होता है।”

राजा ने जीवन भर इस कथा का प्रचार किया। उसके बाद भी पीढ़ी दर पीढ़ी यह कथा सुनाई जाती रही। कहते हैं कि जहाँ भी कोई व्यक्ति स्वार्थ छोड़कर दूसरों के हित में कार्य करता है, वहाँ अदृश्य रूप से ईश्वर की कृपा उपस्थित होती है।

समय बीतता गया, राज्य बदले, युग बदले, पर यह कथा मनुष्यों को यह स्मरण कराती रही कि मनुष्य का वास्तविक धन उसका हृदय है। यदि वह करुणा और मंगल की भावना से भरा हो तो उसका जीवन स्वयं ही व्रत बन जाता है। और वही जीवन अंततः परम शांति की ओर ले जाता है।

इस प्रकार कल्याण की भावना ही कल्याण व्रत का मूल है, और इस कथा का स्मरण मनुष्य को भीतर से परिवर्तित कर देता है। जो इसे सुनकर अपने आचरण में उतारता है, उसका जीवन और उसके आसपास का संसार दोनों धीरे-धीरे प्रकाशमय हो जाते हैं, क्योंकि ईश्वर का निवास उसी हृदय में होता है जो सबके लिए शुभ सोचता है। यही सनातन सत्य है और यही इस कथा का अमर संदेश है।


8️⃣ समापन 🪔

संध्या समय आरती करें और प्रार्थना करें —

“हे लक्ष्मी-नारायण! मेरे जीवन से सभी कष्ट दूर कर, सद्बुद्धि, स्वास्थ्य और समृद्धि प्रदान करें।”

ब्राह्मण, गौ, गरीब या जरूरतमंद को दान देकर व्रत पूर्ण करें।
अंत में प्रसाद ग्रहण कर परिवार में वितरित करें।



🪔 भद्रा व्रत कथा 🪔


1️⃣ मंगलाचरण 🙏

ॐ गणानां त्वा गणपतिं हवामहे
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
ॐ शनैश्चराय नमः
ॐ भद्रायै नमः

हे भगवान श्रीहरि विष्णु, श्रीगणेश, सूर्यदेव तथा काल की अधिष्ठात्री देवी भद्रा!
आपकी कृपा से यह व्रत विधिपूर्वक सम्पन्न हो तथा जीवन के समस्त अशुभ कार्य नष्ट हों — ऐसी प्रार्थना है। 🌼


2️⃣ परिचय 📜

भद्रा व्रत का सम्बन्ध पंचांग की भद्रा (विष्टि करण) से है।
हिन्दू ज्योतिष में भद्रा को अत्यंत प्रभावशाली काल माना गया है।

🔹 जब भी पंचांग में विष्टि करण आता है — वही भद्रा कहलाती है
🔹 इसे अशुभ कर्मों को रोकने वाली दैवी शक्ति माना गया है
🔹 विवाह, यात्रा, गृह प्रवेश जैसे मांगलिक कार्य इसमें निषिद्ध माने गए हैं

लेकिन —
👉 भद्रा की शांति, ग्रह बाधा निवारण, शत्रु शमन, न्याय विजय और सुरक्षा के लिए यह व्रत किया जाता है।

इस व्रत को करने से व्यक्ति के जीवन में

  • बाधाएँ कम होती हैं
  • दुर्घटना योग शांत होते हैं
  • न्यायिक समस्याएँ कम होती हैं
  • शनि एवं कालदोष शांत होते हैं

3️⃣ शास्त्रीय आधार 📖

धर्मशास्त्र, मुहूर्त चिंतामणि, निर्णय सिंधु और ज्योतिष ग्रंथों में भद्रा को अत्यंत प्रभावशाली बताया गया है।

विष्टि करण को देवी का रूप माना गया है

भद्रा सूर्य पुत्री तथा शनि की बहन कही गई है
यह काल की प्रहरी है — जो अधर्म कार्य रोकती है

भद्रा का निवास (मुख्य मान्यता)

भद्रा का स्थान फल
स्वर्ग शुभ
पृथ्वी अत्यंत अशुभ
पाताल मध्यम

👉 इसलिए भद्रा में कार्य न करने का नियम है, पर उसकी पूजा करने से दोष शांत होता है।


4️⃣ पूजा विधि 🪔


व्रत का दिन

जब भी पंचांग में भद्रा (विष्टि करण) हो — उसी दिन किया जाता है
(विशेषतः अमावस्या, चतुर्दशी, अष्टमी या शनिवार को श्रेष्ठ)


आवश्यक सामग्री 🧺

  • काला तिल
  • सरसों का तेल
  • काली वस्तु (कपड़ा)
  • दीपक
  • जल का कलश
  • काला पुष्प / नीला पुष्प
  • दुर्वा
  • गुड़
  • तिल के लड्डू
  • शनि प्रतिमा या पत्थर

पूजन क्रम 🔔

(1) स्नान

सुबह ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नान करें
काले तिल जल में डालकर स्नान करना श्रेष्ठ


(2) संकल्प

दक्षिण दिशा की ओर मुख करके संकल्प लें —

👉 मैं भद्रा काल दोष शांति, शनि पीड़ा निवारण और जीवन की बाधा शांति हेतु यह व्रत कर रहा/रही हूँ


(3) स्थापना

  • भूमि पर काला कपड़ा बिछाएँ
  • उस पर शनि/भद्रा प्रतीक स्थापित करें
  • कलश रखें

(4) पूजा

क्रमशः अर्पण करें:

  • जल 💧
  • अक्षत 🌾
  • तिल ⚫
  • दुर्वा 🌿
  • काला पुष्प 🌸
  • तेल दीपक 🪔

(5) मंत्र जप

108 बार जप करें:

ॐ भद्रायै नमः
ॐ शनैश्चराय नमः
ॐ कालरूपिण्यै नमः


(6) नैवेद्य

गुड़ और तिल के लड्डू अर्पित करें 🍘


(7) दान

शाम को दान करें:

  • काला तिल
  • काला कपड़ा
  • तेल
  • लोहे की वस्तु

5️⃣ व्रत का फल 🌟

इस व्रत से निम्न फल प्राप्त होते हैं:

✔ शनि पीड़ा शांत
✔ कोर्ट केस में राहत
✔ दुर्घटना से रक्षा
✔ शत्रु बाधा समाप्त
✔ बार-बार कार्य बिगड़ना बंद
✔ भय, अशांति, बेचैनी समाप्त
✔ अचानक हानि रुकती है
✔ ग्रह बाधा कम होती है

👉 विशेष फल:
भद्रा दोष में जन्मे व्यक्ति के लिए अत्यंत लाभकारी


6️⃣ नियम 📿

व्रत में इन बातों का पालन करें:

🚫 मांस, शराब, तामसिक भोजन वर्जित
🚫 झूठ, क्रोध, अपशब्द न बोलें
🚫 बाल और नाखून न काटें
🚫 मांगलिक कार्य न करें

✔ ब्रह्मचर्य का पालन
✔ दक्षिण दिशा सम्मान
✔ पीपल को जल देना
✔ कुत्ते या कौवे को भोजन देना


7️⃣🪔 भद्रा व्रत कथा प्रारंभ 🪔

प्राचीन काल में हिमालय की पवित्र श्रेणियों के समीप एक अत्यंत समृद्ध और धर्मपरायण राज्य था। उस राज्य का नाम सुवर्णपुरी था और वहाँ के राजा धर्मवर्मा बड़े न्यायप्रिय, सत्यवादी तथा प्रजावत्सल थे। उनकी प्रजा उन्हें पिता के समान मानती थी और राज्य में वर्षा समय पर होती, अन्न भंडार भरे रहते, गौएँ निर्भय विचरतीं और रोग-शोक का नाम भी नहीं था। राजा की रानी का नाम सुशीलादेवी था जो पतिव्रता, दयालु और धर्मनिष्ठ थीं, किंतु दोनों के जीवन में एक ही अभाव था—उनके कोई संतान नहीं थी।

वर्षों तक यज्ञ, दान, तप और तीर्थ करने के बाद भी जब संतान प्राप्ति नहीं हुई तो रानी अत्यंत दुखी रहने लगीं। एक दिन राजमहल में एक तेजस्विनी वृद्धा ब्राह्मणी भिक्षा मांगने आई। रानी ने अत्यंत श्रद्धा से उन्हें भोजन कराया और अपने मन का दुख बताया। ब्राह्मणी ने कुछ क्षण ध्यान लगाया और बोली—“राजमाता, तुम्हारे भाग्य में संतान है किंतु एक अदृश्य दोष उसे रोक रहा है। जब तक उस दोष का निवारण नहीं होगा, तुम्हें संतान सुख नहीं मिलेगा।”

रानी ने हाथ जोड़कर उपाय पूछा। वृद्धा बोली—“यह दोष भद्रा का है। काल की एक विशेष शक्ति जिसे भद्रा कहा गया है, उससे तुम अनजाने में अप्रसन्न हो गई हो। यदि तुम भद्रा देवी की कथा श्रवण और स्मरण करोगी, उनका व्रत करोगी और हृदय से क्षमा मांगोगी, तब तुम्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति होगी।” इतना कहकर वह ब्राह्मणी अदृश्य हो गई। रानी समझ गईं कि वह कोई साधारण स्त्री नहीं, स्वयं देवदूत थी।

रानी ने राजा को सब बताया। राजा ने राज्य के ऋषियों को बुलाया। महान तपस्वी महर्षि वत्स आए और बोले—“भद्रा कोई साधारण शक्ति नहीं, वह काल की दंडनायिका है। शुभ कर्म में विघ्न डालना उसका कार्य नहीं, किंतु अधर्म या असावधानी होने पर वह परिणाम अवश्य देती है। जो उसे सम्मान देता है, उसके जीवन से संकट दूर हो जाते हैं।”

रानी ने श्रद्धा से भद्रा देवी की कथा सुननी आरंभ की।

सृष्टि के आरंभ में जब ब्रह्मा ने काल की रचना की, तब समय को विभाजित करने के लिए अनेक शक्तियाँ उत्पन्न हुईं। उनमें एक अत्यंत प्रचंड तेज वाली देवी प्रकट हुईं। उनका रूप गंभीर था, नेत्र अग्नि के समान, और वे न्यायप्रिय थीं। देवताओं ने पूछा—“देवि, आपका क्या कार्य होगा?” तब ब्रह्मा बोले—“यह भद्रा है, समय की प्रहरी। यह मनुष्य के कर्मों की परीक्षा लेगी। जो धर्मानुसार कार्य करेगा उसे सुरक्षा देगी, और जो नियमों का अपमान करेगा उसके कार्य में बाधा डालेगी ताकि वह सावधान हो जाए।”

भद्रा ने प्रणाम कर कहा—“मैं किसी से द्वेष नहीं करूँगी, केवल कर्म के अनुसार फल दूँगी।” तभी से संसार में भद्रा का विधान माना गया।

समय बीता। पृथ्वी पर एक व्यापारी था—धनपाल। वह अत्यंत धनवान था परंतु अहंकारी भी था। उसे किसी शुभ-अशुभ मुहूर्त का आदर नहीं था। एक बार उसने अपनी पुत्री का विवाह ऐसे समय पर रखा जब भद्रा काल था। नगर के ब्राह्मणों ने समझाया—“यह समय उचित नहीं, विवाह टाल दो।” पर वह बोला—“धन ही सबसे बड़ा देवता है, समय क्या बिगाड़ेगा!”

विवाह आरंभ हुआ। मंगल गीत गूंजे, अग्नि जली, परंतु जैसे ही कन्यादान होने लगा अचानक आकाश में काले बादल छा गए, तेज आँधी चली और मंडप गिर पड़ा। घोड़े भाग गए, दीप बुझ गए, और वर घायल हो गया। विवाह रुक गया। धनपाल अत्यंत दुखी हुआ और तब उसे अपनी भूल का ज्ञान हुआ। उसने पश्चाताप किया और भद्रा देवी से क्षमा मांगी। कुछ दिनों बाद पुनः उचित समय में विवाह हुआ और सब मंगलमय हुआ। तभी से लोग समझ गए कि भद्रा का अनादर विनाश का कारण बनता है।

इसी प्रकार एक बार एक राजा ने युद्ध आरंभ करने का निश्चय किया। उसके मंत्री ने कहा—“आज भद्रा का प्रभाव है, सेना को विश्राम दें।” पर राजा ने अहंकार में आदेश दिया—“आज ही आक्रमण होगा।” युद्ध शुरू होते ही उसके रथ के पहिए दलदल में धँस गए, हाथी बिदक गए और शत्रु ने विजय प्राप्त की। हारकर राजा को भी ज्ञात हुआ कि समय का सम्मान ही बुद्धिमानी है।

यह कथा सुनकर रानी का विश्वास दृढ़ हुआ। वह प्रतिदिन भद्रा देवी का स्मरण करने लगीं और मन ही मन प्रार्थना करतीं—“हे काल की अधिष्ठात्री, यदि मैंने कभी अनजाने में आपका अपमान किया हो तो क्षमा करें।”

कुछ महीनों बाद रानी को शुभ संकेत मिलने लगे। महल में सुगंध फैलती, स्वप्न में एक तेजस्विनी देवी उन्हें आशीर्वाद देतीं। उचित समय आने पर रानी ने एक सुंदर पुत्र को जन्म दिया। पूरे राज्य में आनंद छा गया। राजा ने उसका नाम भद्रसेन रखा।

बालक बड़ा होकर अत्यंत तेजस्वी, विनम्र और न्यायप्रिय बना। वह हर कार्य से पहले समय और धर्म का विचार करता। प्रजा कहती—“यह तो स्वयं भद्रा का वरदान है।”

वर्षों बाद पड़ोसी राज्य के राजा ने बिना कारण युद्ध छेड़ दिया। भद्रसेन ने ज्योतिषियों से परामर्श लिया। उन्होंने कहा—“आज युद्ध आरंभ न करें, कल शुभ समय है।” भद्रसेन ने धैर्य रखा। अगले दिन युद्ध हुआ और वह विजयी हुआ। उसने कहा—“विजय मेरी नहीं, समय के सम्मान की है।”

एक दिन वह वन में शिकार पर गया। वहाँ उसने एक तपस्वी को ध्यान में लीन देखा। अचानक आकाश से भयंकर गर्जना हुई और एक दैत्य प्रकट हुआ। उसने तपस्वी पर आक्रमण किया। भद्रसेन ने धनुष उठाया पर उसे स्मरण हुआ कि उस समय भद्रा काल था। उसने तुरंत युद्ध न कर ध्यान लगाया और देवी से रक्षा की प्रार्थना की। तभी तेज प्रकाश प्रकट हुआ और वही प्रचंड रूप वाली देवी सामने आईं। दैत्य भस्म हो गया।

देवी ने कहा—“राजकुमार, तुमने उतावलापन नहीं किया, इसलिए मैंने रक्षा की। जो धैर्य रखता है वही संकट से बचता है।”

भद्रसेन ने प्रणाम किया और पूछा—“माता, क्या मनुष्य का भाग्य समय से बंधा है?” देवी बोलीं—“भाग्य कर्म से बनता है, पर समय उसका दर्पण है। जो समय का सम्मान करता है, वह अपने कर्मों को सही दिशा देता है।”

राजकुमार लौटकर आया और उसने राज्य में घोषणा की—“कोई भी कार्य जल्दबाजी में न करे, पहले विचार करे।” राज्य और अधिक सुखी हुआ।

समय बीता, राजा वृद्ध हुए और भद्रसेन गद्दी पर बैठा। उसने न्याय, दया और धैर्य से राज्य चलाया। लोग कहते—“जहाँ धैर्य और मर्यादा हो, वहाँ भद्रा स्वयं रक्षा करती है।”

एक दिन वही वृद्धा ब्राह्मणी पुनः प्रकट हुईं। उन्होंने कहा—“राजन, तुम्हारी माता की श्रद्धा ने तुम्हें जन्म दिया और तुम्हारे विवेक ने राज्य को सुख दिया। यही भद्रा का संदेश है—समय का सम्मान ही जीवन की रक्षा है।”

इतना कहकर वह अंतर्धान हो गईं। राजा समझ गया कि वह स्वयं देवी थीं। उसने जीवन भर विनम्रता रखी और उसका राज्य युगों तक समृद्ध रहा।

इस प्रकार कहा जाता है कि जो मनुष्य अहंकार छोड़कर धैर्य, विचार और समय का सम्मान करता है, उसके जीवन से विपत्ति दूर रहती है और भद्रा की कठोरता भी उसके लिए रक्षा बन जाती है। यही कारण है कि प्राचीन काल से लोग हर कार्य से पहले समय का विचार करते हैं और मानते हैं कि प्रकृति का नियम ही सबसे बड़ा नियम है। जो उसे समझ लेता है, वही सच्चे सुख को प्राप्त करता है।


8️⃣ समापन 🌺

संध्या समय दीपक जलाकर प्रार्थना करें —

हे कालरूपिणी भद्रा देवी!
मेरे जीवन के समस्त अशुभ समय, बाधाएँ, संकट और भय दूर करें।
शनि दोष, ग्रह पीड़ा तथा अकाल कष्टों का नाश करें।
मेरे कार्य सिद्ध हों और जीवन में स्थिरता प्राप्त हो।

ॐ शांति शांति शांति