🪔 अनंत चतुर्दशी व्रत कथा 🪔
🕉️ 1️⃣ मंगलाचरण
हे अनन्त भगवान! आप ही समस्त लोकों के आधार, अनादि-अनन्त परमात्मा तथा समय के भी स्वामी हैं। आपकी शरण से ही जीवन में स्थिरता, समृद्धि और संकटों से रक्षा प्राप्त होती है। हम श्रद्धा-भक्ति से इस अनन्त चतुर्दशी व्रत का संकल्प करते हैं — कृपा कर हमारे जीवन को भी अनन्त सुख, शांति और धर्म से परिपूर्ण करें। 🙏✨
📖 2️⃣ परिचय
📜 3️⃣ शास्त्रीय आधार
यह व्रत स्कन्द पुराण तथा अन्य वैष्णव ग्रंथों में वर्णित है।
शास्त्रों में भगवान विष्णु को ही अनन्त ब्रह्म कहा गया है —
वही अनन्त समय हैं, वही धर्म के आधार हैं, वही सृष्टि का पालन करते हैं।
🪔 4️⃣ पूजा विधि
🧹 (1) प्रातः तैयारी
- प्रातः स्नान करके स्वच्छ पीले या लाल वस्त्र पहनें
- घर या पूजा स्थान शुद्ध करें
- लकड़ी की चौकी पर पीला वस्त्र बिछाएँ
🪷 (2) स्थापना
चौकी पर स्थापित करें —
- भगवान विष्णु या अनन्त स्वरूप चित्र/प्रतिमा
- कलश (जल, आम्रपल्लव, नारियल सहित)
- शेषनाग का चित्र/आकृति (यदि उपलब्ध हो)
🧵 (3) अनन्त सूत्र बनाना
- कच्चे सूत या रेशमी धागे में 14 गांठें लगाएँ
- हल्दी या केसर से रंगें
- यही “अनन्त डोरा” कहलाता है
🌼 (4) पूजन सामग्री
- कुंकुम, अक्षत
- दूर्वा
- पंचामृत
- धूप-दीप
- फल-मिष्ठान
- पूड़ी-हलवा (विशेष नैवेद्य)
🪔 (5) पूजन क्रम
- गणेश पूजन
- कलश पूजन
- भगवान विष्णु/अनन्त पूजन
- शेषनाग पूजन
- 14 गांठों वाले डोरे का पूजन
🧵 (6) डोरा बाँधना
- पुरुष 👉 दाहिने हाथ में
- स्त्री 👉 बाएँ हाथ में
“ॐ अनन्ताय नमः” बोलकर बाँधें
🍚 (7) नैवेद्य
पूड़ी-हलवा अर्पित करें, फिर परिवार सहित प्रसाद ग्रहण करें।
🌟 5️⃣ फल
इस व्रत के करने से —
📿 6️⃣ नियम
- व्रत दिनभर श्रद्धा से रखें (फलाहार या निराहार)
- क्रोध, झूठ और अपशब्द से बचें
- नमक-रहित भोजन उत्तम माना गया
- डोरा 14 दिन या अगले वर्ष तक रखें (परम्परा अनुसार)
- 14 वर्षों तक व्रत करने का विशेष महत्व
🚫 निषेध
- डोरे का अपमान
- व्रत बीच में छोड़ना
- अशुद्ध अवस्था में पूजा
7️⃣🪔 अनंत चतुर्दशी व्रत कथा प्रारंभ 🪔
बहुत प्राचीन समय की बात है, जब पृथ्वी पर धर्म, सत्य और तप की महिमा चारों ओर विद्यमान थी, तब सुमन्त नाम के एक ब्राह्मण रहते थे। वे वेदों के ज्ञाता, सत्यवादी और शांत स्वभाव के थे, परंतु उनका पारिवारिक जीवन अत्यंत दुखों से भरा था। उनकी पहली पत्नी का नाम दीक्षा था, जो अत्यंत पतिव्रता और धर्मपरायण थी। उसी के गर्भ से एक सुंदर और तेजस्विनी कन्या उत्पन्न हुई जिसका नाम सुषीला रखा गया। लेकिन दुर्भाग्य से सुषीला के जन्म के कुछ ही समय बाद उसकी माता का देहांत हो गया। सुमन्त ने समाज के आग्रह पर दूसरी पत्नी करकशा से विवाह किया। जैसा नाम वैसा स्वभाव — वह स्त्री कठोर वाणी बोलने वाली, ईर्ष्यालु और अत्यंत क्रूर थी।
बचपन से ही सुषीला ने सुख का मुख नहीं देखा। उसकी सौतेली माँ उसे हर समय तिरस्कार करती, भूखा रखती, और कठिन कार्य करवाती। वह नन्ही बालिका घर का सारा काम करती, गोबर उठाती, जल भरती, चूल्हा जलाती, और रात को भूखी सो जाती, पर उसके मुख से कभी शिकायत नहीं निकली। वह मन ही मन भगवान विष्णु का स्मरण करती और सोचती कि कोई तो होगा जो सब देख रहा है। धीरे-धीरे वह कन्या बड़ी हुई और उसके रूप तथा विनम्र स्वभाव की चर्चा दूर-दूर तक फैल गई।
जब वह विवाह योग्य हुई तब सुमन्त ने एक योग्य वर की खोज की। उन्हें कौण्डिन्य नाम का एक विद्वान ब्राह्मण मिला जो अत्यंत तेजस्वी, वेदों का ज्ञाता और स्वाभिमानी था। सुमन्त ने प्रसन्न होकर अपनी कन्या का विवाह कौण्डिन्य से कर दिया। परंतु करकशा को यह विवाह बिल्कुल पसंद नहीं था क्योंकि वह सुषीला से घृणा करती थी। विवाह के बाद जब विदाई का समय आया तो उसने दहेज में कुछ भी देने से मना कर दिया। बहुत आग्रह करने पर उसने केवल थोड़ा सा आटा, एक टूटी टोकरी और कुछ बर्तन दे दिए। सुमन्त लज्जित थे पर वे असहाय थे।
कौण्डिन्य और सुषीला विवाह के बाद अपने आश्रम की ओर पैदल ही चल पड़े। मार्ग लंबा था और सूर्य अस्त होने को था। चलते-चलते वे एक नदी के किनारे पहुँचे जहाँ कुछ स्त्रियाँ अत्यंत श्रद्धा से पूजा कर रही थीं। वे पीले वस्त्र पहने थीं, भूमि को गोबर से लीपकर चौक बनाया था और वहाँ एक धागे में चौदह गाँठें बाँधकर पूजन कर रही थीं। सुषीला ने कौतूहलवश उनसे पूछा — “हे माताओं, आप कौन सा व्रत कर रही हैं? इसका क्या फल है?”
स्त्रियों ने प्रेम से कहा — “यह अनन्त भगवान का व्रत है। जो मनुष्य श्रद्धा से यह व्रत करता है उसके सभी दुःख दूर हो जाते हैं, घर में धन, सुख और शांति आती है तथा भगवान विष्णु स्वयं उसकी रक्षा करते हैं।” सुषीला ने विनम्रता से निवेदन किया कि उसे भी विधि बताई जाए। उन्होंने उसे चौदह गाँठों वाला अनन्त सूत्र दिया और कहा कि श्रद्धा से इसे धारण करना, यह स्वयं भगवान अनन्त का स्वरूप है।
सुषीला ने अत्यंत श्रद्धा से भगवान का स्मरण कर वह सूत्र अपने हाथ में बाँध लिया और पति के साथ आगे बढ़ गई। रात को वे एक वृक्ष के नीचे ठहरे और अगले दिन अपने निवास स्थान पहुँच गए। आश्चर्य की बात यह हुई कि जहाँ पहले एक छोटा सा जर्जर आश्रम था, वहाँ अब सुन्दर भवन खड़ा था, गौशाला में गायें थीं, अन्न के भंडार भरे हुए थे और चारों ओर समृद्धि थी। कौण्डिन्य आश्चर्यचकित रह गए।
कुछ ही समय में उनका जीवन अत्यंत सुखमय हो गया। धन, सम्मान, यश और वैभव सब उनके चरण चूमने लगे। लोग उन्हें महान ब्राह्मण कहकर आदर देने लगे। परंतु मनुष्य का स्वभाव विचित्र है — जब सुख मिलता है तो वह उसके कारण को भूल जाता है। एक दिन कौण्डिन्य की दृष्टि सुषीला के हाथ में बँधे धागे पर पड़ी। उन्होंने पूछा — “यह क्या है?”
सुषीला ने विनम्रता से कहा — “यह अनन्त भगवान का सूत्र है, इन्हीं की कृपा से हमें यह वैभव प्राप्त हुआ है।”
कौण्डिन्य को यह सुनकर क्रोध आ गया। वे स्वाभिमानी थे और उन्हें लगा कि उनकी तपस्या और विद्या का अपमान किया जा रहा है। उन्होंने कहा — “मेरे परिश्रम से यह सब मिला है, किसी धागे से नहीं!”
इतना कहकर उन्होंने वह सूत्र तोड़कर अग्नि में फेंक दिया। सुषीला ने घबराकर उसे निकालकर दूध में रखा परंतु अपमान तो हो चुका था। उसी क्षण से उनके दुर्भाग्य का आरम्भ हुआ।
कुछ ही दिनों में घर का धन नष्ट हो गया, गौशाला खाली हो गई, अन्न समाप्त हो गया, मित्र दूर हो गए, और दरिद्रता ने घेर लिया। जो लोग पहले सम्मान करते थे वे तिरस्कार करने लगे। अंततः ऐसी स्थिति आई कि उन्हें घर छोड़कर वन में भटकना पड़ा।
कौण्डिन्य को समझ आ गया कि यह सब भगवान अनन्त के अपमान का परिणाम है। वे अत्यंत पश्चाताप करने लगे और भगवान की खोज में निकल पड़े। वे पर्वतों, नदियों, जंगलों में भटकते रहे। मार्ग में उन्हें एक आम का वृक्ष मिला जो सूखा खड़ा था। उन्होंने उससे पूछा — “क्या तुमने अनन्त भगवान को देखा?” वृक्ष बोला — “मैं अपने पूर्व जन्म में एक पंडित था, ज्ञान था पर घमंड भी था, इसलिए आज वृक्ष बनकर खड़ा हूँ, मैं नहीं जानता।”
आगे बढ़े तो एक गौ माता मिली, वह अत्यंत दुर्बल थी। उसने कहा — “मैं पूर्व जन्म में धनी स्त्री थी, दान नहीं किया इसलिए यह दशा है।” फिर एक बैल मिला जो थका हुआ था, उसने भी यही कहा। एक गधा मिला, एक हाथी मिला — सभी अपने कर्मों का फल भोग रहे थे पर किसी को भगवान अनन्त का पता न था।
कौण्डिन्य निराश होकर आगे बढ़ते रहे। अंत में वे अत्यंत थककर भूमि पर गिर पड़े और रोते हुए बोले — “हे अनन्त प्रभु, मैं अपराधी हूँ, मुझे क्षमा करें।”
तभी वहाँ एक वृद्ध ब्राह्मण प्रकट हुए। उन्होंने प्रेम से उन्हें उठाया और एक गुफा में ले गए जहाँ दिव्य प्रकाश फैल रहा था। वहाँ कौण्डिन्य ने दिव्य सिंहासन पर चतुर्भुज भगवान विष्णु को शेषनाग पर विराजमान देखा। उनकी आँखों से आँसू बह निकले।
भगवान ने कहा — “हे कौण्डिन्य, मैंने ही तेरी परीक्षा ली थी। तूने अभिमानवश मेरा अपमान किया, इसलिए यह कष्ट भोगा। अब यदि तू चौदह वर्षों तक श्रद्धा से अनन्त व्रत करेगा तो सब सुख प्राप्त करेगा।”
कौण्डिन्य ने प्रणाम कर क्षमा माँगी और व्रत करने का संकल्प लिया। जैसे ही उन्होंने संकल्प लिया, वे अपने आश्रम में लौट आए। वहाँ सुषीला उनकी प्रतीक्षा कर रही थी। उन्होंने पूरी कथा सुनाई और दोनों ने श्रद्धा से अनन्त भगवान का स्मरण किया।
समय बीतता गया और उन्होंने नियमपूर्वक श्रद्धा रखी। धीरे-धीरे उनके जीवन में फिर से सुख आने लगा। धन, सम्मान और शांति लौट आई, पर अब उनमें अहंकार नहीं था। वे जानते थे कि सब भगवान की कृपा है।
उनका जीवन अंत तक सुख और धर्म में बीता और मृत्यु के बाद वे विष्णुलोक को प्राप्त हुए।
इसी कारण जो मनुष्य श्रद्धा से अनन्त भगवान का स्मरण करता है, अहंकार त्यागता है और विश्वास रखता है, उसके जीवन के बंधन कट जाते हैं और उसे अनन्त सुख प्राप्त होता है।
8️⃣ समापन
जो व्यक्ति अनन्त भगवान को जीवन का आधार मानता है, उसका भाग्य भी अनन्त हो जाता है।
ॐ अनन्ताय नमः — हमारे जीवन में भी सुख-समृद्धि अनन्त हो। 🌼🕉️